ऋण हर्ता मंगल स्तोत्र

मंगल साधना

“साध्यते अनेन इति साधना”प्रत्येक साधक जो सनातन परम्परा से जुड़ा हुआ है,वह किसी न किसी ईष्ट साधना में अवश्य लगा रहता है!जब कोई साधक अपनी इन्द्रियों को संयम में रख कर नित्य अपने ईष्ट के ध्यान में लगा रहता है तथा मन में अभीष्ट वर प्राप्ति का लक्ष्य लिए रहता है ऐसी स्थिति को साधना कहा जा सकता है,यद्यपि यह शब्द साधना के विषय में बहुत कम हैं फिर भी समझने के लिए इतना ही पर्याप्त है की किसी कार्य को साधने के लिए जो निमित्त के लिए निष्ठा पूर्वक किया जप तप इत्यादि को साधना कहते हैं !

साधना के प्रकार

साधना सामान्यतया दो प्रकार की होती है सात्विकी साधना और तामसी या फिर तांत्रिकी साधना !

सात्विकी साधना उच्च साधना है जिसमें साधक बिना किसी हिंसा,वैर ,द्वेष आदि की भावना के साधना के पथ पर आगे बढ़ता रहता है,और उसकी यह साधना इस लोक के साथ परलोक में भी उसके लिए कल्याणकारी रहती है !इस साधना से जातक अपने ईश की कृपा से दिव्य सद्गुणों से विभूषित हो जाता है साथ ही उसकी ख्याति भी युगों युगो तक स्थिर रहती है

तामसी साधना

तामसी साधना में बहुत ही सावधानी रखनी होती है इसमें जातक सिद्धियां तो बहुत जल्दी ही प्राप्त कर लेता है,परन्तु इनके प्रभाव से जातक अगर किसी को कष्ट पहुंचता है तो उसका समूल नाश समयानुसार निश्चित है! इस साधना के अंतर्गत बहुत से कार्य आपत्तिजनक भी करने होते हैं जिनसे सामान्य जन को कष्ट पहुँचता है,हिंसा होती है,जिससे की साधक इस लोक में भले ही सुख प्राप्त कर ले परन्तु परलोक में उसका पतन होता है,

परन्तु अगर कोई बुद्धिमान जनकल्याण के लिए तांत्रिकी साधना का पथ स्वीकार करता है और अच्छे सद्गुरु की शरण ग्रहण करता है और गुरु के ही मार्गदर्शन के अनुसार साधना करता है तो दोनों ही लोकों में उसकी ख्याति होती है!

साधना क्यों

इस संसार में ऐसा कोई प्राणी नहीं है जिसे कोई न कोई समस्या न हो !उन समस्याओं के निराकरण के लिए वह सतत प्रयास भी करता रहता है परन्तु सफलता उसके हाथ नहीं लगती है ! यह संसार एक परा शक्ति द्वारा संचालित होता है जिसे देव ,ईश्वर,भगवान अनेक नामों से पुकारा जाता है !जो दोनों रूपों में साकार तथा निराकार रूप में विद्यमान रहता है!उसे प्राप्त करने के लिए अनेक साधन है जैसे वर्षा का जल नदी नालों से होता हुआ अंत में समुद्र में ही पहुँचता है या किसी स्थान के लिए जैसे सीधे अथवा टेढ़े मेढ़े रास्ते होते हैं परन्तु लक्ष्य सभी का एक ही होता है

[रुचीनां वैचित्र्याऋजु कुटिलनानापथजुषां नृणामको गम्यः त्वमसि सामर्णव इव ]

मंगल साधना के लाभ

मंगल भूमि के पुत्र है जिनकी साधना या जिनकी प्रशन्नता से व्यक्ति ऋण [कर्ज] से मुक्ति पाने के लिए करता है !अगर किसी व्यक्ति को कर्ज बहुत अधिक रहता हो शत्रु परेशान करते हों तो मंगल की साधना करनी चाहिए !भूमि पुत्र भौम शत्रुओं का नाश तो करते ही है साथ ही धन और धान्य को भी प्रदान करते हैं !

व्रत

साधक को चाहिए की मंगलवार के दिन से मंगल के व्रत रखे !व्रत में प्रातकाल उठकर संध्या वंदन करें ,उसके बाद लाल पीठ बनाकर स्वर्ण अथवा ताम्बे की प्रतिमा बनाकर मंगलदेव का पूजन करे लाल वत्र चढ़ाएं मीठा भोग लगाएं तथा मीठा ही भोजन स्वयं भी करना चाहिए !

मंगल के २१ या ४५ व्रत करके उसका उद्यापन विधि से करना चाहिए ,क्योंकि बिना उद्यापन के व्रत निष्फल हो जाता है !

सावधानियां

मंलवार का व्रत रखते समय बर्ह्मचर्य का पालन करना अतीव अनिवार्य है !उत्तेजनात्मक दृश्य नहीं देखने चाहिए,इन्द्रियों पर संयम रखना चाहिए और उस दिन मंगल का बीज मंत्र का जाप करते रहना चाहिए !मीठा ही भोजन एक समय करना चाहिए !काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद ,मत्सर्य भावों से दूर रहना चाहिए ! मंगल की साधना में त्रुटि करने पर उसके दुष्परिणाम भी भोगने पड़ सकते हैं !

मंगल स्तोत्र

इस पूजा साधना में सबसे महत्वपूर्ण है मंगल का ऋणहर्ता स्तोत्र जिसका पाठ इतना लाभकारी है की साधकों के मुख से जिन्होंने इसके लाभ प्राप्त किये हैं उनसे सुनकर आश्चर्य चकित हो जाते हैं !इसमें कोई संदेह नहीं है की मंगल स्तोत्र का चमत्कारी प्रभाव बहुत शीघ्र देखने को मिलता है!

ऋणहर्ता मंगल स्तोत्र

इस स्तोत्र को पढ़ने से पूर्व अंगन्यास करें जो की ॐ क्रां क्रीं क्रों सः भौमाय नमः इस मंत्र से करने चाहिए ,तत्पश्चात स्त्रोत्र का पाठ करना चाहिए और अंत में अर्पण भी करना चाहिए

मङ्गलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः ।
स्थिरासनो महाकायः सर्वकर्माविरोधकः ।।

लोहितो लोहितांगश्च सामगानां कृपाकरः ।
धरात्मजः कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दनः ।।

अङ्गरको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः ।

वृष्टे: कर्ताअ्पहर्ता च सर्वकामफलप्रदः ।।

एतानि कुजनामनि नित्यं यः श्रध्दया पठेत् ।
ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात् ।।

धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम् ।
कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम् ।।

स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभिः ।
न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पाअ्पि भवति क्वचित् ।।

अङ्गारक महाभाग भगवन्भक्तवत्सल ।

त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय ।।

ऋणरोगादिदारिद्रयं ये चान्ये ह्यपमृत्यवः ।
भयक्लेशमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा ।।

अतिवक्र दुरारार्ध्य भोगमुक्त जितात्मनः ।
तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ।।

विरिचिशक्रविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा ।
तेन त्वं सर्वसत्त्वेन ग्रहराजो महाबलः ।।

पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गतः ।

ऋणदारिद्रयदुःखेन शत्रूणां च भयात्ततः ।।

एभिर्द्वादशभिः श्लोकैर्यः स्तौति च धरासुतम् ।

महतिं श्रियमाप्रोति ह्यपरो धनदो युवा ।।

इति श्री ऋणमोचक मङ्गलस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ।।

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