कर दर्शन का वैज्ञानिक रहस्य

क्या है कर दर्शन

सनातन धर्म वैज्ञानिक रहस्यों से भरा पड़ा है यही कारण है कि इस धर्म का प्रत्येक अंग अपने आप में

कुछ न कुछ विशेषता समेटे रखता ही है,

आज हम बात कर रहे है कर दर्शन की,

कर दर्शन का मतलब है अपने हाथों का दर्शन करना,

हमें स्कूल में ही अध्यापक बताने लग जाते हैं कि प्रातः काल उठ कर अपने हाथों का दर्शन करना चाहिए,

जिसका मन्त्र है

कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती।

करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनं।।

अर्थात हाथ के अग्र भाग में लक्ष्मी का वास होता है

,हाथ के मध्य भाग में भगवती सरस्वती का वास होता है

और हाथ के मूल भाग में भगवान विष्णु का वास होता है इसलिए सुबह उठते ही

अपने हाथ में इन तीनों का दर्शन करना चाहिए।

यह तो था इस श्लोक का शाब्दिक अर्थ अब बात करते है इसके विशिष्ट अर्थ की

विशिष्ट अर्थ

कोई भी काम करना हो तो उसमें हमारी उंगलियों के विशेष कार्य होता है और

उस कार्य से हमे धन(लक्ष्मी) की प्राप्ति होती है

इसलिए प्रातः उठते ही अपने कर्म में संलग्न हो जाएं अपने अधूरे या नए काम को देखे

उसे करना प्रारम्भ कर देंजिससे धन की प्राप्ति होगी,

करमध्ये सरस्वती

…हाथ के मध्य भाग में सरस्वती का वास है…

.यह मंत्र हमें संकेत कर रहा है कि जब हम आने काम को कर रहे हैं तो

उसे इतनी निष्ठा से करें कि दिन प्रतिदिन उस कार्य मे नई नई तकनीक हम खोज सकें

,और वैसे भी अनुभव किसी भी कार्य को करते रहने से ही प्राप्त होता है

और यह अनुभव ही सार्थक ज्ञान भी होता है

इसलिए अपने कर्म के साथ साथ उस कर्म में निष्ठा अगर है तो नया ज्ञान हमें प्राप्त होता है

यह तो हर व्यक्ति अनुभव कर सकता है।

करमूले तु गोविन्दः….

अब जब हम अपने कर्म को निष्ठा पूर्वक करते हैं और नई से नई तकनीकों तरीकों का अनुभव हमे प्राप्त होता है

तो अंततः तत्व की प्राप्ति होने लग जाती है कार्य कोई भी हो

उसका अंतिम लक्ष्य तो भगवत प्राप्ति ही है

और अगर ऐसा नही है तो वो कार्य ही निरर्थक है,

एक छोटा सा श्लोक हमें जीवन जीने की कला को सिखाता है

इन श्लोकों में गूढातीगूढ़ रहस्यों का उद्घघाटन किया जा सकता है

अगर कोई तन मन से इन श्लोकों को आत्मसात करे।

।।इति।।

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