ज्योतिष

भारतीय वर्षाविज्ञान

प्राचीन काल के ऋषियों मुनियों के पास आज की तरह न तो विकसित वेदशालाएँ थीं और न सूक्ष्म
परिणाम देने वाले आधुनिकतम वैज्ञानिक उपकरण , फिर भी वे अपने अनुभव तथा अतीन्द्रिय ज्ञान के
सहारे आकाशीय ग्रह नक्षत्रों आदि का अध्ययन करके वर्षोपूर्व मौसम का पूर्वानुमान कर लेते थे ।

यद्यपि
वैदिक संहिताओं ,पुराणों , स्मृतियों में इस विज्ञान का उल्लेख मिलता है, फिर भी आचार्य वराहमिहिर का
इसमें विशेष योगदान रहा है । उन्होंने अपने ग्रन्थ बृहत्संहिता में इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला है ।
संहिता ग्रन्थो में तो ऐसे मन्त्रों का भी विधान है , जिनके द्वारा यथेच्छ रूप से वर्षा के आयोजन और
निवारण को नियंत्रित किया जा सकता है ।
ऋतुचक्र का प्रवर्तक सूर्य होता है । सूर्य जब आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश करता है तभी से औपचारिक रूप से वर्षा
ऋतु का प्रारम्भ माना जाता है । भारतीय पंचांगकार प्रति वर्ष आर्द्रा प्रवेश कुंडली बनाकर भावी वर्षा की
भविष्यवाणी करते हैं । आर्द्रा से नौ नक्षत्र पर्यन्त वर्षा का समय माना जाता है ।
गर्ग पराशर आदि ऋषियों के समय तो यह विज्ञान गुरु शिष्य परम्परा में रहा । कालांतर में अनेक
ज्योतिर्विदों द्वारा इसे सर्वसुलभ कराया गया ।

कर्मफल और अरिष्टनिवारण मीमांसा

ज्योतिष शास्त्र के विशेषज्ञ किसी भी मनुष्य के भावी सुख दुःख की भविष्यवाणी करते हैं । और ग्रहों को
इनका हेतु मानकर अरिष्ट निवारणार्थ ग्रहशांति के लिए दान जप हवन आदि के उपाय बताते हैं , परन्तु
मनुष्य के सुख दुःख के कारण वास्तव में ग्रह नक्षत्र नही हैं । महाभारत के अनुशासन पर्व में भगवती उमा
महेश्वर से इस सम्बंध में जिज्ञासा करती हुई यह पूछती है –

संसार में ऐसी मान्यता है कि लोगों के समस्त
सुख दुःख के कारण ग्रह हैं । अतः शुभाशुभं कर्म को ग्रहजनित मानकर लोग प्रायः ग्रह नक्षत्रों की उपासना
करते हैं , जबकि शास्त्र का मत है कि मनुष्य अपने अच्छे बुरे कर्मों के कारण ही सुख दुःख भोगते है । अतः
आप इस संदर्भ में मेरा सन्देह निवारण करने की कृपा करें । भगवतीं उमा के इस प्रश्न का उत्तर देते हुए
महेश्वर कहते हैं कि देवि । तुम्हारा सन्देह उचित है किंतु ग्रह नक्षत्र मनुष्यों के शुभ ,अशुभ के निवेदकमात्र है
, न् की वे स्वयं कर्मफल प्रदान करते हैं –

नक्षत्राणि ग्रहश्चैव शुभाशुभनिवेदकाः ।
मानवानां महाभागे न तु कर्मकराः स्वयम् ।।

ग्रहनक्षत्र शुभ , अशुभ , कर्मफल को उपस्थित नहीं करते हैं , अपना ही किया हुआ सारा कर्म शुभाशुभ
फल का उत्पादक होता है ।
इस प्रकार उमा , महेश्वर संवाद से यह तथ्य स्पष्ट होता है कि कोई ग्रहविशेष किसी प्राणी के सुख , दुःख
का कारण नही होता , अपितु मनुष्य अपने नियत प्रारब्ध का ही भोग करता है ।
भावी या वर्तमान दुःखों का ग्रह सम्बन्धी अध्ययन करके ज्योतिषी दान , जप , हवन , रत्नधारण आदि
शांति के उपाय बताते हैं । इन उपायों के द्वारा साध्य पाप कर्म के फल भोग से तो मुक्ति मिल जाती है ,
या दुःख में कुछ कमी अवश्य आ जाती है किंतु आसाध्य पाप के फल भोग में जप ,तप ,पूजा प्रार्थना
आदि भी अपना पूरा प्रभाव नही दिखा पाते ।

कर्मफल वर्णन

वस्तुतः एक सामान्य व्यक्ति में यह सामर्थ्य नही होती कि वह किसी दुःख क्लेश के साध्य , असाध्य की
पहचान कर सके , इसलिए हर दुःखसन्तप्त व्यक्ति यथाशक्ति शांति कर्म आदि के उपायों को ग्रहण
करता है और इस प्रयत्न में ज्योतिषशास्त्र उसका मार्गदर्शन करता है , किन्तु लोक में होनहार बलवान के
आगे सबको इसका लाभ नहीं प्राप्त होता ।” भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी ” यह कथन परं सत्य है ,परन्तु
इसके लिए भूतभावन भगवान विशेश्वर की कृपा आवश्यक है ।

अगर ब्रह्माण्डनायक परमपिता परमेश्वर
प्रसन्न हो जाएं ,तब तो कुछ भी सम्भव है , तभी तो महर्षि मार्कण्डेय ने मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली और
भगवान श्री कृष्ण की कृपा से उत्तरा का मृतशिशु पुनः जीवित हो उठा । इसलिए परमार्थ ,सत्य और सेव्य
एक मात्र भगवान हैं ।
इस गौरवशाली ज्योतिषशास्त्र को केवल फलकथन का साधन कहना कष्ट की बात है । आज व्यवसायिक
धरातल पर आ जाने से इस शास्त्र की महती हानि हो रही है और ज्योतिषशास्त्र का जो तात्त्विक लाभ
मिलना चाहिए , उसकी प्राप्ति तो दुर्लभ सी हो गयी है । ज्योतिषशास्त्र तो उपासना एवं सत्कर्म की प्रवृत्ति
देता है, मनुष्य को सन्मार्ग में प्रेरित करता है । परमात्मा प्रभु से प्रार्थना है कि वे सर्वसाधारण को
शास्त्रनिष्ठा के प्रति सद्बुद्धि प्रदान करें और विशेष रूप से ज्योतिषशास्त्र का संरक्षण करके अभ्युदय एवं
निःश्रेयस का मार्ग प्रशस्त करने की कृपा करें ।

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