ज्योतिष

पैतामह सिद्धांत

नमोअ्स्तु विद्यावितताय चक्रिणे
समस्तधीस्थानकृते सदा नमः ।

जो सम्पूर्ण विद्याओं के आश्रय , चक्रधारी तथा समस्त ज्ञानेन्द्रियों को व्याप्त करके स्थित है । उन ब्रह्मा जी
को सदा नमस्कार है ।

सृष्टिकर्ता तथा शास्त्ररक्षणकर्ता के रूप में पितामह ब्रह्माजी का लोक पर महान अनुग्रह है । वे पिताओं के
भी पिता हैं । इसलिए पितामह कहलाते है ।

उत्पत्ति

उनका आविर्भाव प्रलयपयोधि में योगिन्द्रा का आश्रयणकर
शयन कर रहे भगवान नारायण के नाभिकमल से हुआ । स्वयं आविर्भूत होने से स्वयम्भू कहलाते हैं ।
प्रादुर्भूत होते ही इन्होंने तप का आश्रय लिया ।

दीर्घ तप के फलस्वरूप इन्हें सर्वेश्वर नारायण का दर्शन
हुआ । उन्हीं के परामर्श से उन्होंने सृष्टिसँरचना का संकल्प लिया । भगवान की प्रेरणा से देवी सरस्वती ने
उनके हृदय में प्रविष्ट होकर उनके चारों मुखों से ज्योतिष आदि वेदांगों तथा उपवेदों सहित चारों वेदों का
स्वर गान कराया । उनका आविर्भाव सर्वप्रथम हुआ । वे ही विश्व की रचना करने वाले , पालन करने वाले
तथा उसकी रक्षा करने वाले हैं ।

” ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता ,


यह समस्त दृश्य , अदृश्य जगत् तथा समस्त जीवनिकाय भगवान ब्रह्माजी द्वारा ही सृष्ट है । भगवान की
अचिन्त्य शक्ति से प्रेरित होकर जब ब्रह्मा जी ने अनेक प्रकार की सृष्टि की , किन्तु उससे उन्हें सन्तोष नही
हुआ , तब उन्होंने मनुष्य – शरीर की सृष्टि की , इसकी रचना करके वे बहुत आनन्दित इसलिए हुए की इस

मानव सृष्टि

शरीर से मनुष्य ब्रह्मसाक्षात्कार कर सकता है । –

सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयात्मशक्तया
वृक्षान् सरिसृप्पशुन् खगदंशमत्स्यान् ।
तैस्तैरतुष्टहृदयः पुरुषं विधाय
.. ब्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देवः ।।


भगवान के अवतरण के मूल प्रेरक भी ब्रह्मा जी ही हैं । ये समस्त कल्याण के मूल कारण है । समस्त
प्रजाएँ प्रजापति ब्रह्मा जी की संतानें हैं । वे अपनी प्रजा , संततियों का सब प्रकार अभ्युदय देखना चाहतें
हैं । उन्होंने जँहा अपने उपदेशों से जीव को भगवन मार्ग में प्रेरित होने का संदेश दिया , वही उनके लिए
शाश्वत संविधान – वेदों आदि शास्त्रों का भी प्राकट्य कर दिया । व्यक्ति धर्माचरण करता रहे , सदाचार
का पालन करे , इसके लिए उन्होंने अनेक प्रकार के नीतिधर्मों की उद्भावना की है । ब्रह्माजी कालतत्व

(Visited 873 times, 1 visits today)

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *