ज्योतिष

कालतत्व

के सम्यक अवबोधक है । सृष्टि जगत् में जीवों के साथ ही प्रकृति के सम्पूर्ण स्वरूपों का ज्ञान उन्होंने
कराया है । यह दृश्य एवं अदृश्य जगत् किस प्रकार गतिशील है , प्रकृतिका तथा ब्रह्माण्डीय गतियों का
जीव से क्या सम्बन्ध है , पिंड और बह्मांड का परस्पर क्या सम्बन्ध है , मनुष्य के दैनन्दिन गतिविधियों पर
इन ग्रह ,नक्षत्रों का क्या प्रभाव पड़ता है , कालतत्व क्या है । इसको जानने की विधियाँ क्या है , ये
ब्रह्माण्डीय पिंड आकाश में इधर से उधर गतिशील क्यों है , ये उदय , अस्त होते क्यों दिखाई देते हैं , इनका
प्रेरक कौन है , नियामक कौन है – इस विषय के ब्रह्मा जी प्रत्यक्ष द्रष्टा है ।

ब्रह्मा की आयु

ज्योतिषं का मुख आधार काल है
, उस कालमान की गणना ब्रह्माजी की आयु से ही होती है , जो ब्राह्म मान कहलाता है । ब्रह्माजी के दिन
ही इस सृष्टि का समय है । इस सृष्टि में सौर जगत् की भी सृष्टि होती है । ब्रह्मा जी का दिन ही कल्प
कहलाता है । एक कल्प में चौदह मन्वन्तरों का समय होता है । ब्रह्माजी के दिन के उदय के साथ ही
त्रैलोक्य की सृष्टि होती है । उसके दिन की समाप्ति होने पर उतनी ही बड़ी उनकी रात्रि होती है । ब्रह्माजी
की परमायु ब्राह्म मान से एक सौ वर्ष है ।

इसे ‘ पर ‘ कहते है । इस समय ब्रह्माजी अपनी आयु का आधा
भाग अर्थात् एक परार्ध बिताकर दूसरे परार्ध में चल रहे हैं । यह उनके ५१ वें वर्ष का प्रथम दिन या कल्प है ।
ब्रह्मा के प्रथम परार्ध में कल्पों की गणना रथन्तरकल्प से होती है । और ब्रह्मा के द्वितीय परार्ध के आदि
का कल्प श्वेतवाराहकल्प कहलाता है । यह द्वितीय परार्ध का प्रथम कल्प है । इस कल्प के चौदह
मन्वन्तरों में से छः मन्वन्तर व्यतीत हो चुके हैं । और २८ वें महायुग के सत्य , त्रेता , द्वापर बिताकर २८ वाँ
कलियुग चल रहा है ।

कालगणना

यह कालगणना ज्योतिष शास्त्र का मुख्य विषय है । प्रत्येक धर्म – कर्मादि के आरम्भ में जो संकल्प किया जाता है
, उसमें देश और कालका ही स्मरण किया जाता है । संकल्प में देश के अंतर्गत इस ब्रह्मांड के चतुर्दश
भुवनों , सप्तद्वीपों , खण्ड , वर्ष आदि के साथ ही काल के अंतर्गत सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के परार्ध , कल्प ,
मन्वन्तर , युगादि से लेकर संवत, अयन, ऋतु , मास , पक्ष , तिथि , वार , करण , योग , ग्रहों की गोचर स्थिति
तथा लग्नादिका उच्चारण किया जाता है । इस प्रकार ब्रह्माजी की आयु से ही कालतत्व का निर्धारण होता
है । अहर्गण का प्रारम्भ कब से होगा , युग का , संवत्सर का आरम्भ कब से होगा , एक वर्ष का मान
कितना है , ऋतुओं की गणना कहाँ से प्रारम्भ होगी , ग्रहों का संचार तथा उदय – अस्त का निर्धारण कैसे
होगा ? इसके अधिष्ठाता सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ही हैं ।

ब्रह्माजी के एक दिन बिताने के अनन्तर प्रलय होती है । जो नैमित्तिक , दैनन्दिन या कल्प प्रलय कहलाता
है । ब्रह्माजी की आयु के दोनों पारार्धों के बिताने पर प्राकृतिक महाप्रलय होता है , जिसमें सृष्टिकर्ता ब्रह्मा
तथा समस्त ज्योतिर्जगत का लय होता है । तदनन्तर समस्त ब्रह्माण्ड का पूर्ण ब्रह्म परमात्मा में लय होता है
। जो आत्यंतिक प्रलय कहलाता है । पुनः काल कर्म और स्वभाववश उस निराकार से साकार सृष्टि की

उत्तपत्ति होती है और ज्योतिश्चक्र का प्रवर्तन होता है , यही सृष्टि और प्रलय का क्रम अनादिकाल से चला
आ रहा है ।

(Visited 873 times, 1 visits today)

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *