ज्योतिष

सिद्धांत

सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी के द्वारा वेदों के साथ ही ज्योतिष शास्त्र की भी उत्तपत्ति हुई , यह सर्वथा प्रसिद्ध है ।
ब्रह्माजी ही पितामह हैं और उनके द्वारा उद्भूत ज्योतिष सिद्धान्त पितामहसिध्दान्त कहलाता है । उन्होंने
यज्ञसाधननिमित्तिक चार वेदों को अपने चार मुखों से प्रकट किया , जिनका मन्त्रद्रष्टा ऋषियों ने संग्रह
किया । यज्ञों का सम्पादन कालज्ञान के आधार पर ही सम्भव होता है । अतः यज्ञ की सिद्धि के लिए
ब्राह्मजी ने कालावबोधक ज्योतिषशास्त्र का परण्यनकर अपने पुत्र नारदजी को दिया ।

नारद जी ने इस
शास्त्र के महत्व को समझते हुए लोक में इसका प्रवर्तन किया । नारदजी स्वयं कहते हैं । कि यह
ज्योतिष शास्त्र वेदांग कहलाता है । यह जगत् के शुभाशुभ का निरूपण करता है ।
यज्ञ , अध्ययन , सक्रांति का पुण्यकाल , ग्रह षोडशवर्ग – इनके यथार्थ समय का निर्णय ज्योतिष शास्त्र
द्वारा ही होता है । बिना ज्योतिष के ज्ञान के श्रोत – स्मार्त कर्मों की सिद्धि नही होती । अतः जगत् के
कल्याण के लिए ब्रह्मा जी ने प्राचीनकाल में इस शास्त्र की रचना की –


विनैतदखिलं श्रौतं स्मार्तं कर्म न सिद्धयति ।
तस्माज्जगद्धितायेदं ब्रह्मणा रचितं पुरा ।।

ऋषि मत

इसी प्रकार गणकशिरोमण श्री गर्गाचार्य जी कहते हैं । कि स्वयम्भू ब्रह्मा जी ने द्विजन्मा लोगों के नेत्ररूप
इस वेदांगशास्त्र का स्वयं निर्माण किया , जो यज्ञ के लिए हितकारी है । ब्रह्माजी द्वारा निर्मित क्रिया एवं
काल के साधक इस ज्योतिषशास्त्र को मैंने उनके द्वारा ही प्राप्त किया –
स्वयं स्वयम्भूवा सृष्टं चक्षुर्भूतं द्विजन्मनाम् ।
वेदाङ्गं ज्योतिषं ब्रह्मापरं यज्ञहितावहम् ।
मया स्वयम्भुवः प्राप्तं क्रियाकालप्रसाधनम् ।।

आचार्य पराशर जी ने होराशास्त्र के सर्वाधिक मान्य आचार्य है , ने लिखा है कि मैंने ब्रह्माजी के मुख से
जैसे सुना है , वैसे ही वेद के चक्षुः स्वरूप इस ज्योतिषशास्त्र को मैं कहूँगा –
वक्ष्यामि वेदनयनं यथा ब्रह्ममुखाच्छुतम् ।

इस ज्योतिष शास्त्र के प्रादुर्भाव तथा उसकी परम्परा का उल्लेख करते हुए पराशर जी कहते हैं । कि हे
मैत्रेय जी ! ज्योतिषरूप यह वेदांगशास्त्र वेद का चक्षुस्वरुप है , आद्य है , ब्रह्माजी ने वेदों से ही इसे ग्रहण
करके गर्गाचार्य जी को बताया और गर्ग जी ने मुझे बताया । उनसे मैंने जैसे सुना , उसे यथावत रूप में
तुमसे कहा है –
वेदेभ्यश्च समुद्धृत्य ब्रह्मा प्रोवाच विस्तृतं ।।
शास्त्रमाद्यं तदेवेदं वेदाङ्गं वेदचक्षुषी ।
गार्गस्तस्मादिदं प्राह मया तस्माद्यथा ।।
तदुक्तं तव मैत्रेय शास्त्रमाद्यं तमेव हि ।

द्वादश भाव वर्णन

एक दूसरे स्थल पर पुनः पराशर जी कहते हैं कि मैं कुंडली के द्वादश भावों के विषय में कुछ विशिष्ट बात
कहने जा रहा हूँ , जैसे कि मैंने भगवान ब्रह्मा के मुख से सुना है –

किञ्चित् विशेषं कथयामि यथा ब्रह्ममुखाच्छ्रुतम् ।


अवन्तिकाचार्य श्रीवराहमिहिर ने अपने ग्रन्थ बृहत्संहिता के प्रारम्भ में उल्लेख किया है कि मैं सर्वप्रथम मुनि
ब्राह्मजी द्वारा विस्तारपूर्वक कहे गए सत्यरूप ज्योतिषशास्त्र का अवलोकन करके ही इस ग्रन्थ का प्रणयन
कर रहा हूँ – ” प्रथममुनिकथितमवितथमवलोक्य ग्रन्थविस्तरस्यार्थम् ” ।
इस प्रकार आचार्य ने ब्रह्माजी के शास्त्र का उपकार स्वीकृत किया है , इसी दृष्टि से उन्होंने ग्रन्थ के अंत में
पूर्वाचार्यों को विनय से प्रणाम किया है ।

नमोस्तु पूर्वप्रणेतृभ्यः “
आचार्य कमलाकरभट्ट ने नवीनसिद्धान्त पन्चकं की शिष्य परम्परा में उल्लेख किया है कि ब्रह्माजी ने
नारद जी को जो सिद्धान्त उपदिष्ट किया , वह ब्राह्मसिद्धान्त कहलाया – ब्रह्मा प्राह नारदाय “
इससे सिद्ध है कि ब्रह्माजी ने स्वनिर्मित ज्योतिषशास्त्र को नारद , गर्ग , पराशर , आदि को उपदिष्ट किया
। आर्यभट्ट , ब्रह्मगुप्त , वराहमिहिर आदि परवर्ती अन्य ग्रन्थकर्ता भी उनसे उपकृत रहे । ज्योतिषं कि आर्ष
संहिताओं में ज्योतिषशास्त्र के अठारह , कहीं – कहीं उन्नीस आद्य आचार्यों का परिगणन हुआ है , उनमें
श्रीब्रह्माजी का नाम प्रारम्भ में लिया गया है ।

नारद मत


ज्योतिषाचार्य नारद के अनुसार ज्योतिषशास्त्र के अठारह प्रवर्तक इस प्रकार है । –
ब्रह्माचार्यो वसीष्ठोअ्त्रिर्मनुः पौलस्त्यरोमशौ ।

मरीचिरङ्गिरा व्यासो नारदो शौनको भृगुः ।।
च्यवनो यवनो गर्गः कश्यपश्च पराशरः ।
अष्टादशैते गम्भीरा ज्योतिश्शास्त्रप्रवर्तकाः ।।


महर्षि कश्यप

यहाँ महर्षि कश्यप ने आचार्यों की नामावली इस प्रकार निरूपित किया है –
सूर्यः पित्तामहो व्यासो वसिष्ठोअ्त्रिः पराशरः ।
कश्यपो नारदो गर्गो मरीचिर्मनुरङ्गिराः ।।
लोमेशः पौलिशश्चैव च्यवनो यवनो भृगुः ।
शौनकोअष्टादशाश्चैते ज्योतिः शास्त्रप्रवर्तकाः ।।

पराशर जी के मत


किन्तु पराशर जी के मत से पुलस्त्य नाम के एक आद्य आचार्य भी हुए हैं , इस प्रकार ज्योतिष शास्त्र
प्रवर्तक आचार्य उन्नीस हैं । यथा –


विश्वसृङ् नारदो व्यासो वसिष्ठोअ्त्रिः पराशरः ।
लोमेशो यवनः सूर्यः च्यवनः कश्यपो भृगुः ।।
पुलस्त्यो मनुराचार्यः पौलिशः शौनकौअङ्गिराः ।
गर्गो मरीचिरित्येते ज्ञेया ज्योतिः प्रवर्तकाः ।।


इस प्रकार पितामह ब्रह्माजी ज्योतिष शास्त्र के आदि उद्भावक आचार्य हैं । चूँकि वे पितामह हैं , अतः उनका
ज्योतिषसिद्धान्त पैतामह सिद्धान्त या ब्राह्म सिद्धान्त कहलाता है ।
कालक्रम से इस समय ब्रह्मा जी का कोई ग्रन्थ उपलब्ध नही होता , अतः उनके ज्योतिषीय अवदान का
इदमित्थं निरूपण करना सम्भव नहीं है । तथापि आचार्य वराहमिहिर ने पैतामह सिद्धान्त संकेत किया है


। ज्योतिष जगत् में अवन्तिकाचार्य वराहमिहिर का नाम बड़े ही आदर से ग्राह्य है , वे ४२७ शक में
विद्यमान थे । पंचसिद्धान्तिका , बृहत्संहिता तथा बृहज्ज़ातक आदि उनके बड़े ही विशिष्ट ग्रन्थ हैं । इन्होने
पंचसिद्धान्तिका नामक ग्रन्थ में गणित के प्राचीन पाँच सिद्धान्तों का वर्णन किया है । इसलिए इसका
पंचसिद्धान्तिका नाम पड़ा । जिनके नाम हैं – १-पौलिश ,२- रोमक , ३- वसिष्ठ ,४- सौर , ५- पैतमाह ।

इस
पंचसिद्धान्तिका के बारहवें अध्याय में पैतमाह ज्योतिष का सारांश दिया है । इस अध्याय में कुल पाँच
श्लोक हैं और ग्रहों का वर्णन बताया गया है । गणित ज्ञान के लिए पैतमाह सिद्धान्त भारतीय ज्योतिषं
का सबसे प्राचीन सिद्धान्त है । इस सिद्धान्त में मध्यमान से सूर्य और चन्द्र की गणना की गयी है तथा
तिथि , नक्षत्र पर्व आदि की गणना भी मध्यममान से की गयी है । पैतमाह सिद्धान्त के अनुसार रवि और

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