ज्योतिष

चन्द्र का युग

चन्द्र का युग पांच वर्ष का होता है । नक्षत्रारम्भ धनिष्ठा से होता है । इस प्रकार से संक्षेप में गणित की बातें
बताई गयी हैं । वेदांगज्योतिष से पैतामह सिद्धान्त का विशेष साम्य है ।
महाभारत के आश्वमेधिक पर्व में एक अनुगीता पर्व है , इसके अवान्तर संवाद में महर्षियों को ब्रह्माजी ने
अनेक प्रकार के उपदेश दिए हैं , बीच बीच में ज्योतिष सम्बन्धी भी संकेत हैं ।

एक स्थल पर ब्रह्माजी ने
बताया कि पहले दिन है फिर रात्रि , अतः रात्रि का आदि दिन है । इसी प्रकार शुक्लपक्ष महीने का आदि है
, श्रवण नाम का नक्षत्र नक्षत्रों का आदि है और ऋतुओं का आदि शिशिर ऋतु है । –
अहः पूर्वं ततो रात्रिर्मासाः शुक्लादयः स्मृताः ।
श्रवणादीनि ऋक्षाणि ऋतवः शिशिरादयः ।।

वर्तमान में पैतामह ज्योतिष के मूलस्वरूप की उपलब्धि न होने से इस सम्बंध कुछ कहना कठिन है , परन्तु
इतना तो निश्चित ही है की अन्य शास्त्रों के समान ही ब्रह्माजी ने सम्पूर्ण ज्योतिषशास्त्र का भी प्रणयन
प्रवर्तन किया है ।

ब्रह्मा जी की ज्योतिर्मयी दिव्य सभा


महाभारत में ब्रह्माजी की एक दिव्य सभा का वर्णन है , जिसका नाम सुसुखा कहा गया है । वह ब्रह्मा जी
के मानसिक संकल्प से उद्भूत है , वह उत्तम सुख देने वाली है , वहाँ भूख प्यास , सर्दी ,गर्मी , का कोई
प्रभाव नहीं है । उस सभा में सम्पूर्ण लोकों के पितामह ब्रह्माजी विराजमान रहते हैं । वहाँ सभी देवता ,
ऋषि , महर्षि उनकी उपासना में निरत रहते हैं । शुक्र , बृहस्पति , बुध , मंगल , शनि , राहु , केतु , आदि सभी
ग्रह समस्त वेद , उपवेद ( आयुर्वेद , धनुर्वेद , गान्धर्ववेद , अर्थशास्त्र ) तथा वेदाङ्ग ये सभी मूर्तिमान स्वरूप
धारणकर उनकी सेवा में उपस्थित रहते हैं –

शुक्रो बृहस्पतिश्चैव बुधोअ्ङ्गारक एव च ।
शनैश्चरश्च राहुश्च ग्रहाः सर्वे तथैव च ।।


वहाँ साक्षात् कालतत्व ,क्षण , लव , मुहूर्त , दिन , रात , पक्ष , मास , छः ऋतुओं , साठ संवत्सर , पाँच
स्वंत्सरों का युग , चार प्रकार के दिन रात , ( मानव , पितर, देवता और ब्रह्मा जी के दिन रात ) वहाँ उनकी
सेवा में तत्पर रहते हैं । और उनके आदेशानुसार गतिमान हो संचालित होते हैं ।

ब्रह्माजी समय समय पर अपनी प्रजा को सन्मार्ग में प्रेरित होने के लिए उपदेश देते हैं एक बार साध्य गणों
से उन्होंने कहा – हे देवो ! पुरुष जैसे लोगों के साथ रहता है जैसे मनुष्यों का संग करता है , और जैसा होना
चाहता है वह वैसा ही हो जाता है ,जैसे वस्त्र जिस रंग में रंगा जाए वैसा ही हो जाता है , इसी प्रकार कोई
सज्जन ,असज्जन ,तपस्वी अथवा चोर का साथ करता है तो वह उन्हीं के जैसा हो जाता है अतः सदा
सज्जनो का ही साथ करना चाहिए –

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यदि सन्तं सेवति यद्यसन्तं
तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव ।
वासो यथा रंगवशं प्रयाति
तथा स तेषां वशमभ्युपैति ।।

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