ज्योतिष

सूर्यसिद्धांत

ज्योतिष शास्त्र वेदांगों में नेत्र संज्ञक हैं यह सभी शास्त्रों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण शास्त्र है आज के वैज्ञानिक युग में इस प्राचीन वैज्ञानिक ग्रंथ का अध्ययन एवं इसपर शोध किये जाने अति अनिवार्य है !

ज्योतिष शास्त्र में सूर्यसिद्धांत के अधिष्ठाता भगवान सूर्य और उनका महनीय चरित


ऊँ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः ।
आंप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ।।

सूर्योपस्थान की यह ऋचा भुवन भास्कर भगवान् सूर्य की महिमा में पर्यवसित है । इसका भाव है – जो
तेजोमयी किरणों के पुंज हैं , मित्र वरुण तथा अग्नि आदि देवताओं एवं समस्त विश्व के प्राणियों के नेत्र हैं
और स्थावर जंगमात्मक समस्त जीवनिकाय के अन्तर्यामी आत्मा है

वे भगवान् सूर्य , आकाश , पृथ्वी ,
और अन्तरिक्षलोक को अपने प्रकाश से पूर्ण करते हुए आश्चर्यरूप से उदित हो रहे हैं ।
ऋषि वसिष्ठ जी उनकी स्तुति करते हुए कहते हैं – जो ज्ञानियों के अंतरात्मा , जगत् को प्रकाशित करने
वाले , संसार के हितैषी , स्वयम्भू तथा सहस्र उद्ददीप्त नेत्रों से सुशोभित हैं ,उन अमित तेजस्वी सुरसरेष्ठ
भगवान् सूर्य को नमस्कार है –

विवस्वते ज्ञानभृदन्तरात्मने जगत्प्रदीपाय जगद्धितैषिणे ।
स्वयम्भुवे दीप्तसहस्रचक्षुषे सुरोत्तमायामिततेजसे ।।

भुवनभास्कर भगवान् सूर्य नारायण प्रत्यक्ष देवता हैं , प्रकाशरूप हैं । उपनिषदों में भगवान् सूर्य के तीन
रूपो का विवेचन हुआ है । १ – निर्गुण निराकार ,२- सगुण निराकार और ३ – सगुण साकार । आदित्यं
ब्रह्मेति ।

चक्षुषोपनिषद में वर्णन आया है कि साँकृत मुनि ने आदित्यलोक में जाकर भगवान् सूर्य से चाक्षुष्मती
विद्या प्राप्त की । ऐसे ही ऋषिप्रवर याज्ञवल्क्य जी ने भी आदित्यलोक में जाकर उनका दर्शन किया और
आत्मतत्त्व का उपदेश प्राप्त किया ।

हनुमान जी द्वारा सूर्य से ज्ञान प्राप्ति

हनुमान जी का उनके द्वारा तत्त्वज्ञान प्राप्त करना प्रसिद्ध ही है – ‘
भानुसों पढ़न हनुमान गये ‘ । भगवान् सूर्य स्वयं प्रमात्मारूप हैं तथा भक्तों के लिए सगुण साकाररूप
धारण करते हैं । विविध विद्यायों का उपदेश देते हैं और स्वयं ग्रहाधिपतिरूप में प्रतिष्ठित होकर
ज्योतिश्चक्र का प्रवर्तन और नियमन करते हैं ।
जैसे भगवान् विष्णु का स्थान वैकुण्ठ , भूतभावन शंकर का कैलाश, चतुर्मुख ब्रह्मा का ब्रह्मलोक और
भगवतीं जगन्माता का मणिद्वीप है ,

वैसे ही आदित्यनारायण का स्थान आदित्यलोक – सूर्यमण्डल है ।
भगवान् सूर्य ही कालचक्र के प्रणोता हैं । सूर्य से ही दिन रात्रि , घटी , पल , मास , पक्ष , ऋतु , अयन तथा

सवंत्सर आदि का विभाग होता है । ये सम्पूर्ण जगत् के प्रकाशक है , इनके बिना सब अंधकार है । सूर्य ही
जीवन , तेज , ओज , बल , यश , चक्षु , श्रोत्र , आत्मा और मन हैं – आदित्यो वै तेज ओजो बलं यशश्चक्षु:
श्रोत्रे आत्मा मन:

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