ज्योतिष

मास

मासश्चैत्रश्च वैशाखो ज्येष्ठश्चाषाढ संज्ञकः !

श्रावणश्चैव भाद्राख्य आश्विनः कार्तिकास्तथा !!

मार्गशीर्षश्च पौषश्च माघश्च फाल्गुनस्तथा !!

१२ मास क्रमशः चैत्र,वैशाख,ज्येष्ठ,आषाढ़,श्रावण ,भाद्रपद,अश्विन,कार्तिक,मार्गशीर्ष,पौष,माघ फाल्गुन,हैं

जिनके वैदिक नाम क्रमशः मधु,माधव,शुक्र,शुचि,नभ,नभस्य,ईश ,ऊर्ज,सिंह,सहस्य ,तप और तपस्य है!

तिथियां

प्रतिपदा,द्वितीया,तृतीया,चतुर्थी,पंचमी,षष्ठी,सप्तमी,अष्टमी,नवमी,दशमी,एकादशी,द्वादशी,त्रोदशी,चतुर्दशी,पूर्णिमा,और अमावस्या है!

एक मास में दो पक्ष और ३० तिथियां होती हैं,जिनमें १५ शुक्ल पक्ष की और १५ कृष्ण पक्ष की होती हैं !

१,६,११, नंदा

२,७,१२, भद्रा

३,८,१३,जया

४,९,१४,रिक्ता

५,१०,१५, पूर्णा यह क्रमशः तिथियों की संज्ञा है ,इनका जैसा नाम है वैसा ही प्रभाव भी है !किसी भी कार्य को करने से पूर्व इन तिथियों के नाम अनुसार फल का विचार कर लेना चाहिए !

नक्षत्र

आकाश मंडल में कुल २७ नक्षत्र हैं,यह २७ नक्षत्रों में ही पूरा ब्रह्माण्ड समाहित है इन नक्षत्रों का प्रत्येक जातक पर विशेष प्रभाव रहता है !२७ नक्षत्रों में अभिजित नक्षत्र की गणना नहीं होती है,अभिजित सहित नक्षत्रों की संख्या २८ है !

योग

नक्षत्रों की तरह योग भी ज्योतिष शास्त्र में विशेष स्थान रखते है योगों का निर्माण सूर्य और चन्द्रमा के प्रतिदिन अंतर् के कारण होता है !योगों की कुल संख्या २७ है !

इष्टकाल बनाने की विधि

सबसे पहले तो यह जानना आवश्यक है की इष्ट काल होता क्या है! इष्ट काल जन्म के समय को कहते हैं,परन्तु जब जन्म का समय ही इष्टकाल है तो उसको बनाने की क्या आवश्यकता है!अब यहाँ हम जिस इष्टकाल को निकलना चाहते हैं वह घटी पलात्मक है परन्तु हमारे पास जो समय दिया होता है वह घंटा मिण्टात्मक होता है उसी को घटी पल में परिवर्तित करके इष्टकाल निकला जाता है!

इष्टकाल की आवश्यकता जन्म कुंडली में सबसे पहला बिंदु होता है अगर इष्टकाल सही है तो कुंडली सही बनेगी अन्यथा किया हुआ सारा परिश्रम व्यर्थ होजाता है !

इष्टकाल का सूत्र

अगर जन्म समय दोपहर १२:५९ मिनट से पहले का हो तो जन्म समय -सूर्य उदय गुणा २.३० =इष्टकाल

अगर जनम समय दोपहर १;०० से रात्रि १२:५९ तक हो तो जन्म समय +१२:०० -सूर्य उदय गुणा ०२.३० = इष्टकाल !

और अगर जन्म समय रात्रि के १ बजे से अगले दिन सूर्य उदय तक का हो तो जन्म समय +२४ – सूर्य उदय गुणा ०२.३० =इष्टकाल

अगर जन्म समय और सूर्य उदय बराबर हो तो इष्टकाल शून्य होगा और अगर इष्टकाल ६०:०० से ज्यादा हो तो उसमे से ६० घटाकर जो शेष बचे वही इष्ट होता है !

भभोग,भयात और भभोग्य !

कुंडली निर्माण में इष्टकाल के बाद आवश्यकता पड़ती है भयात,भभोग और भाभोगयु की ,तो सबसे पहले इन नामों को समझ लीजिये !

भभोग = भ कहते हैं नक्षत्र को और भोग कहते है ग्रहण करने को अर्थात एक नक्षत्र जितने घटी पल यानि समय स्थति में रहेगा उसे भभोग कहते हैं और यह जो नक्षत्र का भोग काल है यह चंद्र नक्षत्र का भोग काल है !इसका अन्य नाम सर्वरक्ष भी है!

इसको निकलने की सामान्य विधि होइ

६०:००-गत नक्षत्र+वर्तमान नक्षत्र=भभोग

भयात

भ कहते हैं नक्षत्र को और यात कहते है बिता हुआ अर्थात जन्म समय {इष्टकाल}तक कितना नक्षत्र बीत चूका है उसे भयात कहते है !इसका अन्य नाम है भुक्त,और भुक्तरक्ष !

इसको निकलने की साधारण विधि है

६०:००-गत नक्षत्र+इष्टकाल=भयात

भभोग्य

भ कहते हैं नक्षत्र को और भोग्य कहते हैं जो भोगने या फिर ग्रहण करने को शेष है अर्थात इष्टकाल के बाद बचे हुए नक्षत्र का मान भभोग्य कहलाता है !इसका अन्य नाम भोग्यरक्ष,भोग्य भी है !इसको साधने का साधारण सूत्र है!

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