ज्योतिष

ब्रह्मा जी की उत्पत्ति

इनके आविर्भाव की परंपरा में बताया गया है कि भगवान् विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्माजी के जन्म हुआ ।
ब्रह्माजी के मानसपुत्र का नाम मरीचि है । महर्षि मारीचि से कश्यप का जन्म हुआ । ये कश्यप ही सूर्य के
पिता हैं , इनकी माता का नाम अदिति है , जो दक्षप्रजापति की पुत्री है , इसलिए ये अदितिनन्दन तथा
मृचिसुनु भी कहलाते हैं ।

भगवान् सूर्य सम्पूर्ण ग्रहों के राजा हैं , जिस प्रकार घर के मध्य भाग में स्थित प्रज्वलित दीपक ऊपर नीचे
सम्पूर्ण घर को प्रकाशित करता है , उसी प्रकार अखिल जगत् के अधिपति सूर्य अपनी हजारों रश्मियों से
लोकों को प्रकाशित करते रहते हैं ।

परम् दिव्य तेजः पुंज ही सूर्य का स्वरूप है । सूर्य का तेजोमण्डल दो
भागों में विभक्त है , सूर्यमण्डल का एक तेज ऊर्ध्व की ओर उद्दीप्त करता है , उस तेज की शक्ति संज्ञा है ,
दूसरा तेज अधोगामी – पृथ्वी से पातालपर्यंत उद्दीपन करता है , उस तेज की शक्ति का नाम छाया है ।
पुराणों में संज्ञा तथा छाया – ये भगवान् सूर्य की दो पत्नियाँ बतायी गयी हैं । ये दोनों उनकी शक्ति के रूप
में निरन्तर गतिशील रहती हैं ।

सूर्यलोक वर्णन

सूर्यलोक में भगवान् सूर्य के समक्ष इन्द्रादि सभी देवता ऋषिगण स्थित रहते हैं तथा गन्धर्व एवं अप्सराएँ
नृत्य गान से उनकी स्तुति करती हैं । तीनों संध्याएं मूर्तिमान रूप में वहाँ उपस्थित रहती हैं । भगवान् सूर्य
सात छंदोमय अश्वों से युक्त हैं , इसलिए वे सप्ताशवतिकल कहलाते हैं ।

वे घटी , पल , ऋतु ,
सनवत्सरादि काल के अवयवों द्वारा निर्मित दिव्य रथपर आरूढ़ होकर सुशोभित रहते हैं । गरुड़ के छोटे
भाई अरुण उनके सारथी का कार्य करते हैं ।

उनके दोनों पार्श्वो में दाहिनी ओर राज्ञी और बायीं ओर
निक्षुभा नाम की दो पत्नियां स्थित रहती हैं उनके साथ पिंगल नाम के लेखक , दण्डनायक नाम के
द्वाररक्षक तथा कल्याण नाम के दो पक्षी द्वार पर खड़े रहते हैं । दिंडी उनके मुख्य सेवक हैं , जो उनके सामने
खड़े रहते हैं ।

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