ज्योतिष

संज्ञा से पुनर्मिलन


सूर्य तत्त्काल संज्ञा को खोजते हुए विश्वकर्मा के घर पहुंचे । उन्होंने बताया कि भगवान् ! आपका तेज
सहन न् कर सकने के कारण संज्ञा अश्वा का रूप धारण कर उत्तर कुरु में तपस्या कर रही है । तब
विश्वकर्मा ने सूर्य की इच्छा पर उनके तेज को खरादकर कम कर दिया ।

अब सौम्य शक्ति से सम्पन्न
भगवान् सूर्य अश्वरूप से वडवा के पास उससे मिले । वडवा ने परपुरुष के स्पर्श की आशंका से सूर्य का
तेज अपने नासाछिद्रों से बाहर फेंक दिया । उसी से दोनों अश्विन कुमारों की उत्तप्ति हुई , जो देवताओं के
वैद्य हुए ।

तेज के अंतिम अंश से रेवन्त नामक पुत्र हुआ , जो गुह्यकों और अश्वों का अधिपति हुआ । इस
प्रकार भगवान् सूर्य का विशाल परिवार यथास्थान प्रतिष्ठित हो गया । यथा – वैवस्वत मनु वर्तमान मन्वन्तर
के अधिपति हैं ।

यम यमराज एवं धर्मराज के रूप में जीवों के शुभाशुभं कर्मों के फलों को देने वाले हैं ।
यमी यमुना के रूप में लोगों के उद्धार में लगी हैं । अश्विनीकुमार देवताओं के वैद्य हैं । रेवन्त निरन्तर
भगवान् सूर्य की सेवा में रहते हैं ।

सूर्य पुत्र शनि ग्रहों में प्रतिष्ठित हैं ।

कुरुवंश

सूर्यकन्या तपती का विवाह सोमवंशी
अत्यंत धर्मात्मा राजा संवरण के साथ हुआ , जिनसे कुरुवंश के स्थापक राजर्षि कुरु का जन्म हुआ । इन्हीं

से कौरवों की उत्तप्ति हुई । विष्टि भद्रा नाम से नक्षत्र लोक में प्रविष्ट हुई । सावर्णि मनु आठवें मन्वन्तर के
अधिपति होंगे । इस प्रकार भगवान् सूर्य का विस्तार अनेक रूपों में हुआ है वे आरोग्य के अधिपति हैं –
आरोग्यं भास्करादिच्छेत ” ।

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