ज्योतिष

ग्रहों के रूप में सूर्य का स्वरूप निरूपण


ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों के रूप में सूर्य का जो विचार हुआ है , उसका संक्षेप में सार इस प्रकार है –
सूर्य सिंह राशि के स्वामी हैं । मेष राशि के दस अंश में स्थित होकर उच्च तथा तुला राशि में नीच कहलाते
हैं । इनका आकार ह्रस्व , समवृत , वर्ण , क्षत्रिय , प्रकृति , पुरुष , संज्ञा क्रूर , गुण , सत्व ,रंग लाल

,निवासस्थान देवालय भूलोक एवं अरण्य , उदय प्रकार पृष्ठोदय , प्रकृति पित्त , दृष्टि आकाश की ओर
तथा मुँह पूर्व की ओर रहता है । ये कटु रस के विधाता तथा धातुस्वरूप है । अग्नि इनके देवता हैं , माणिक्य
धारण करने तथा हरिवंशपुराण के श्रवण से सूर्यकृत अरिष्ट की शांति होती है ।

सूर्य से विचारणीय

ये ग्रहों के राजा हैं इनकी
मंगल , चन्द्रमा और बृहस्पति से नैसर्गिक मित्रता , शुक्र तथा शनि से शत्रुता और बुध से उदासीनता है ।
कुंडली में सूर्य से पिता आत्मा , प्रताप , आरोग्यता और राज्यलक्ष्मी आदि का विचार किया जाता है । ये
अपनी उच्च राशि , द्रेष्काण , होरा , रविवार , नवांश , उत्तरायण , मध्याह्न राशि के आरम्भ , मित्र के नवमांश
तथा लगन से दसवें भाव में सदा बलवान होते हैं ।

ये सदा मार्गी रहते हैं वक्री नही होते । विशोंत्तरी दशा के
अनुसार सूर्य की महादशा छः वर्ष रहती है । सूर्य मेषादि द्वादश राशियों में भ्रमण करते है । एक राशि से
दूसरी राशि के संक्रमण को संक्रमित कहते हैं । इस प्रकार भ्रमण से द्वादश राशियों के बारह सौरमास तथा
एक सौरवर्ष होता है ।

सूर्य एक राशि में एक मास रहते हैं मकर तथा कर्क से अयन सक्रान्तियाँ बनती हैं ।
मकरसक्रान्ति से उत्तरायण तथा कर्कसक्रान्ति से दक्षिणायन होता है । मेष तथा तुला की संक्रांति
विषुवसंक्रान्ति कहलाती है । धनु , मिथुन , कन्या , मीन की संक्रांतियां षडशीतिमुखा ओर सिंह , वृश्चिक ,
वृष , और कुम्भ की संक्रांतियां विष्णुपदा कहलाती है ।

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