ज्योतिष

ज्योतिष सिद्धान्त के उद्भावक के रूप में भगवान् सूर्य

ज्योतिष शास्त्र में सिद्धान्त के प्रवर्तक आद्य आचार्यों के रूप में दैवज्ञ नारद महर्षि पराशर तथा ऋषिप्रवर कश्यप
जी ने जिन अठारह आचार्यों का परिगणन किया है उनमें भगवान् सूर्य के नाम मुख्य रूप से उल्लिखित हैं
किंतु भगवान् सूर्य द्वारा प्रत्यक्ष उपदिष्ट अथवा रचित कोई ग्रन्थ वर्तमान में उपलब्ध नही हैं ।

सूर्यसिद्धान्त
का सर्वाधिक प्राचीन उल्लेख आचार्य वराहमिहिर ने किया है वराहमिहिर महान दैवज्ञ हो चुके हैं उन्होंने
ज्योतिष के तीनों स्कंधों – सिद्धान्त , संहिता , तथा होरा पर ग्रन्थ प्रणयनकर लोक का महान उपकार
किया है ।

जातकशास्त्र में उनका फलित विषयक बृहज्जातक अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रन्थ हैं । सहिंता के
विषयों को उन्होंने बृहत्संहिता में संग्रहित किया है । सिद्धान्त के क्षेत्र में उन्होंने अपने समय में प्रचलित
गणित के प्राचीन पाँच सिद्धान्तों का वर्णन अपने पंचसिद्धान्तिका नामक ग्रन्थ में किया है , वे पाँच
सिद्धान्त इस प्रकार है –
१ – पैतामह सिद्धान्त ,२ – वसिष्ठ सिद्धान्त , ३ – पौलिश सिद्धान्त , ४ – रोमक सिद्धान्त तथा ५ –
पोलिशरोमकवसिष्ठसोर – पैतामहास्तु पञ्चसिद्धान्ताः

पंचसिद्धाँतों में सूर्य सिद्धांत

इन पाँचों सिद्धान्तों में सूर्य सिद्धान्त का विशेष महत्व है क्योंकि अन्य सिद्धान्तों की अपेक्षा यह
विस्तृत है तथा इसके विवेचन की पद्धति अत्यंत सूक्ष्मं है आचार्य वराहमिहिर ने पाँचों सिद्धान्तों का
अनुशीलकर तुलनात्मक दृष्टि से सूर्यसिद्धान्त को अधिक स्पष्ट और शुद्ध बताया है ।

अपनी बात को
आचार्य ने स्पष्टतरः सावित्रः , कहकर व्यक्त किया है । इसी कारण परवर्ती आचार्यों आर्यभट्ट , ब्रह्मगुप्त
वराहमिहिर आदि ने सूर्यसिद्धान्त को अधिक महत्व दिया । पंचसिद्धान्तिका के ९ वें १० वें तथा १३वें
और २७वें इस प्रकार चार अध्यायों में वराहमिहिर आचार्य ने प्राचीन सूर्यसिद्धान्त की व्याख्या की है ।


अध्याय ९ में सूर्यग्रहण गणित , अध्याय १० में चन्द्रग्रहण , अध्याय १३ में ग्रहों के मध्यम मान ज्ञात करने
का गणित तथा १७ वें अध्याय में गणितद्वारा ग्रहों के स्पष्ट मान को ज्ञात करने की विधि वर्णित है ।

वस्तुतः
भारतीय सिद्धान्तज्योतिष में सूर्यसिद्धान्त के गणित से ही पूर्णवैज्ञानिक्ता आयी और यही कारण था
कि सूर्यसिद्धान्त के बाद यद्यपि प्राचीन सिद्धान्तों के नाम वहीं रहे , किन्तु कुछ परिष्कार , संशोधन एवं
परिवर्धन के साथ आगे गणित के सिद्धान्त बने । मूल गणित सिद्धान्त भगवान् सूर्य के नाम पर ही
आज भी प्रचलित है ।

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