ज्योतिष

वर्तमान में उपलब्ध सूर्यसिद्धान्त


वर्तमान में खगोलीय गणित ज्ञान का भगवान् सूर्य के नाम से एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ उपलब्ध है जो
सूर्यसिद्धान्त, के नाम से प्रसिद्ध है । यह ग्रन्थ चौदह अध्यायों में विभक्त है , इसकी श्लोक संख्या ५००
के आसपास है ।

अध्याय ११ तक का नाम पूर्वखण्ड तथा शेष तीन का नाम उत्तरखण्ड है ।
इस ग्रन्थ के प्रादुर्भाव के सम्बंध में ग्रन्थारम्भ में एक रोचक आख्यान आया है , जिसका सारांश यहाँ
उपस्थित है –
प्राचीन काल की बात है मयासुर नामक महान शिल्पी ने सत्ययुग के अंत में वेदांगों में श्रेष्ठ तथा परम्
पुण्यमय तथा अत्यंत रहस्यमय नक्षत्र ज्ञान के श्रेष्ठ ज्ञान को प्राप्त करने के लिए अत्यंत कठोर तप करके
भगवान् सूर्य की आराधना की ।

उसके तप से प्रसन्न हुए भगवान् सविता प्रकट हुए और उसे वरदान देते
हुए बोले – हे दानवश्रेष्ठ मय ! मैं तुम्हारी तपस्या से संतुष्ट हूँ मैंने तुम्हारे अभिप्राय को समझ लिया है , मैं तुम्हें
अवश्य सम्पूर्ण ज्योतिर्विज्ञान का ज्ञान प्रदान करूँगा और उसका रहस्य भी बताऊँगा ,

किन्तु है मय मूल
बात यह है कि इस त्रिलोक में ऐसा कोई नहीं है , जो मेरे तेज को सह सके , जो भी मेरे समक्ष रहेगा , वह मेरे
ताप से दग्ध हो जाएगा और दूसरी बात यह है कि मैं निरन्तर भ्रमण करते है अतः मेरे पास अवकाश भी
नहीं है , इसी कारण मेरा ही अंशभूत पुरुषावतार प्रकट होकर तुम्हें सम्पूर्ण ज्योतिषशास्त्र बतलायेगा –

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