ज्योतिष

सुर्यांशु पुरुष द्वारा मय दानव को ज्योतिष का उपदेश

न मे तेजः सह कश्चिदाख्यातुं नास्ति मे क्षणः ।
मंदशः पुरुषो अयं ते निःशेषं कथयिष्यति ।।


मायसुर से ऐसा कहकर तथा अपने अंशावतार पुरुष को मय के प्रति सम्पूर्ण ज्योतिषशास्त्र उपदिष्ट करने
की आज्ञा देकर भगवान् सूर्य अंतर्धान हो गए , तदन्तर मय ने अत्यंत श्रद्धा भक्तिपूर्वक सूर्याशु पुरुष को
प्रणाम किया ,

तब सूर्यावतार पुरुष ने कहा – हे मय प्रत्येक युग में भगवान् सूर्य ऋषियों को ज्योतिषशास्त्र
का जो उत्तम ज्ञान दिया करते है , उन्ही के अनुग्रह से मैं तुम्हें बताता हूँ , एकाग्र होकर सुनो । तदन्तर
सर्वप्रथम मय से कालतत्त्व का निरूपण करते हुए कहा

– काल के दो रूप हैं एक यो अविभाज्य कालतत्त्व
है , जो शास्त्रप्रमाण द्वारा ही सिद्ध है वह लोकों का अंत करने वाला है काल का दूसरा स्वरूप है , जो
कलनात्मक है विभाज्य है , ज्ञान का विषय है , उसे जाना जा सकता है । यह कलनात्मक काल भी स्थूल
एवं सूक्ष्म दो प्रकार का है –
लोकानामन्तकृतकालः कालोअन्यः कलनात्मकः ।
स द्विधा स्थूलसूक्ष्मत्वान्मूर्तश्चमूर्त उच्यते ।।

इस प्रकार आगे मयासुर को सूर्यांशपुरुष ने सम्पूर्ण गणितशास्त्र का उपदेश दिया , जो मूलतः भगवान्
सूर्य का ही अभिमत था ।

मयद्वारा सूर्यावतार सूर्यांशपुरुष से प्राप्त ज्योतिषशास्त्र विद्या का उल्लेख इसी
ग्रन्थ में अन्यत्र भी आया है वहां भी निर्दिष्ट है कि मयासुर ने परम् भक्तिपूर्वक सूर्यांशपुरुष की पूजाकर
उनसे अनेक प्रश्न किये –
अथार्काशसमुद्भूतं प्रणिप्रत्य कृताञ्जलिः ।
भक्त्या परमयाभ्यर्च्य पप्रच्छेदं मयासुरः ।।

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