ज्योतिष

सूर्यसिद्धांत से परोक्ष लाभ

सम्पूर्ण विद्या देने के अनन्तर सूर्यांशपुरुष बोले – हे सूर्यभक्त दैत्यश्रेष्ठ मय । मैने यह परम अद्भुत रहस्य
तुम्हें बतलाया है , यह सभी पापों का नाश करने वाला तथा परम् पवित्र और ब्रह्मस्वरूप है ।

ग्रहों और
नक्षत्रों से सम्बद्ध यह जो दिव्य ज्ञान तुम्हें प्रदान किया , इसको जान लेने से सूर्यादि लोकों में सदा के लिए
स्थान प्राप्त होता है । – विज्ञेयार्कादिलोकेषु स्थानं प्राप्नोति शाश्वतम् ।।
इस प्रकार मय को भलीभांति उपदेश देने के अनन्तर सूर्यांशपुरुष उनसे पूजितः होकर सूर्यमण्डल में
प्रविष्ट हो गए ।

मय ने भी वह दिव्य ज्ञान प्राप्तकर अपने को धन्य ओर कृतार्थ माना । कालांतर में ऋषियों
को जब यह जानकारी हुई कि मय ने सूर्यभगवान से वर प्राप्त किया है । तो वे भी उसी ज्ञान को प्राप्त करने
के लिए आदरपूर्वक उसके पास गए और प्रसन्न होकर मयासुर ने भी ऋषियों को ग्रहों नक्षत्रों की स्थिति

का भलीभांति ज्ञान काराया – स तेभ्यः प्रपदौ प्रीतौ ग्रहाणां चरितं महत्

सूर्य सिद्धांत में विषय

इस प्रकार भगवान् सूर्य से
प्रकट ज्योतिर्विद्या सूर्यांशपुरुष , मयासुर तथा ऋषियों को अनुक्रम से परम्परया प्राप्त होकर लोक में
प्रचलित हुई ।
सूर्यसिद्धान्त का प्रतिपाद्य विषय
सूर्यसिद्धान्त चौदह अध्यायों में उपनिबद्ध हैं ।

यहाँ प्रत्येक अध्याय की बातें संक्षेप में प्रस्तुत हैं –
१ – प्रथम अध्याय के प्रारम्भ में सूर्यांशपुरुष द्वारा मय को ज्योतिर्विद प्राप्त करने का आख्यान ,
कालविभाग , युगमान , दिन – संख्या , अहर्गण , ग्रहों का मध्य , मंदोच्च और शीघ्र गतिज्ञान करके
वारप्रवृति तथा तात्कालिक ग्रह ज्ञान का गणित वर्णित है ।
२ – दूसरे स्पष्टाधिकार में ग्रहगति का कारण , ग्रहों की आठ प्रकार की गतियों का वर्णन , ज्यानिर्णय
क्रांति ओर केन्द्रसाधन , ग्रहस्पष्ट , भुजांतसंस्कार , अहोरात्रमान , तिथि , नक्षत्र, योग ,तथा करणों आदि के
गणित का वर्णन है ।
३- तीसरे अध्याय को त्रिपरश्नाधिकारी कहा गया है । दिक , देश तथा कालसम्बधि तीन बातों का इसमें
वर्णन है । इसके लिए पलभा , अयनांश , नत्यानयन निरक्षराशिमान , लग्न तथा दशम लग्नज्ञान की
विधियाँ दी गयी हैं ।

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