ज्योतिष

ग्रहणाध्याय


४ – चौथा अध्याय चन्द्रग्रहणाधिकारी है , इसमें सूर्यचन्द्रबिम्ब का ज्ञान , सूर्य तथा चन्द्रग्रहण का स्वरूप
तथा ग्रहण के भेद आदि का गणित है ।
५ – पाँचवे अध्याय में विशेषं रूप से सूर्यग्रहण के गणित का विमर्श करता है ।
६ – छठे छेद्यकाध्याय नामक अध्याय में परिलेखाधिकार का वर्णन है । ग्रहणों के भेद ज्ञान को बताने वाले
छेदक गणित का वर्णन है ।
७ – सातवें अध्याय में ग्रहों की युति दृककर्म , ग्रहबिम्ब तथा ग्रहयुद्ध आदि का वर्णन है ।
८ – आठवें अध्याय में ग्रहों तथा नक्षत्रों की युतिज्ञान का वर्णन है ।
९ – नवें अध्याय में ग्रहों के उदय एवं अस्त होने के गणित तथा काल निर्णय वर्णित है ।

१० – दसवें अध्याय में चन्द्रश्रृंगोंन्ति तथा चन्द्रोदय आदि की विधि वर्णित है ।
११ – ग्यारहवें पाताधिकार नामक अध्याय में वैधृति , व्यतिपात आदि पातों का वर्णन , योग तथा उनका
फल , गण्डक , भसन्धि आदि निरूपित हैं । यहाँ पर ग्रन्थ का पूर्वभाग पूर्ण हो जाता है ।

अन्य


१२ – बारहवें भूगोलाध्याय के प्रारम्भ में मयासुर द्वारा पुनः सूर्यांशपुरुष से प्रश्न हुए हैं । मयासुर ने भूगोल
ज्ञान बताने के लिए निवेदन किया है और कहा है

– हे भगवान् ! इस पृथ्वी का परिणाम क्या है , आकार
कैसा है , यह किसके आश्रय से टिकी है ? इसके कितने विभाग है और किस प्रकार से सात पातालों और
भूमि की अवस्थिति है , किस प्रकार सूर्य दिन रात की व्यवस्था करते हैं तथा किस प्रकार वे विचरण करते
हैं ? देवता और असुरों के दिन रात विपरीत क्यों है इत्यादि । इन सभी प्रश्नों का उत्तर सूर्यांशपुरुष ने उन्हें
दिया और सृष्टि चक्र का वर्णन किया ।

१३ – तेरहवें अध्याय में गोलनिरूपण तथा गोल में मेषादि राशियों का प्रतिस्थापन करके उससे खगोल
ज्ञान का वर्णन है और अनेक प्रकार के कालज्ञानसम्बन्धी शुंक , यष्टि , चक्र आदि छायायन्त्रों के निर्माण
की विधि वर्णित है ।
इस विद्या के फल में सूर्यांशपुरुष बताते है कि ग्रहनक्षत्र के ओर गोल के तत्त्वतः ज्ञान से मनुष्य ग्रह लोक
को प्राप्त कर अंत में आत्मज्ञान से मोक्ष प्राप्त कर लेता है –
ग्रहनक्षत्रचरितं ज्ञात्वा गोलं च तत्त्वतः ।
ग्रहलोकम्वाप्नोति पर्यायेणात्मवान्नरः ।।

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