ज्योतिष

ज्योतिष शास्त्र का माहात्म्य

विष्णु धर्मोत्तर पुराण

वेदा हि यथार्थमभिप्रवृताः
कालानुपूर्वा विहिताश्च यज्ञाः
तस्मादिदं कालाविधान शास्त्रं
यो ज्योतिषं वेद स वेद सर्वम् ।।


वेदों का प्रवर्तन यज्ञों के सम्यक सम्पादन के लिए हुआ । वे यज्ञ भी काल का सम्यक ज्ञान होने पर ही
यथाविधि सम्पन्न होते है यह ज्योतिष शास्त्र काल का विधायक है अतः जो ज्योतिष शास्त्र को जनता है वह सब
कुछ जनता है ( विष्णोत्तरपुराण में पितामहसिध्दान्त )

वेदेषु विद्यासु च ये प्रदिष्टा
धर्मादयोः कालविशेषतोअ्र्थः ।
ते सिध्दिमायान्त्तखिलाश्च येन
.तद्वेदनेत्रं जयतीष्ट लोके ।।


वेदों में तथा अन्य विद्याओं में काल विशेष पर आधारित जो धर्म कर्मादि निर्दिष्ट है वे सभी जिस विद्या के
प्रभाव से सिद्ध होते हैं वेद के चक्षुः स्वरूप उस ज्योतिष शास्त्र की इस संसार में जय हो!

वेद पुरुष का नेत्र

वेदचक्षुः किलेदं ज्योतिषं
मुख्यता चाङ्गमध्येअ्स्य तेनोच्यते ।
संयुतोअ्पीतरैः कर्णनासादिभिः
चक्षुषाङ्गेन हीनो न किन्चत्करः ।।

इस ज्योतिष शास्त्र को वेद का चक्षु कहा जाता गया है इसी कारण वेदांगों में इसकी मुख्यता कही गई है
कर्ण नासिका आदि दूसरे अंगों से सम्पन्न होने पर भी नेत्र रूपी अंग से हीन होने पर मनुष्य कुछ भी करने
में समर्थ नही हो पाता है ।

ज्योतिष शास्त्र की महानता

एकासनस्था जलवायुभक्षा ममुक्षुवस्त्यक्तपरिग्रहश्च ।
पृच्छन्ति तेअ्प्यम्बरचारिचारं दैवज्ञमन्ये किमुतार्थाचिन्ताः ।।

जो एक आसन पर स्थित होकर ध्यान में निमग्न रहते है केवल जल तथा वायु का भक्षण करने वाले हैं
सभी प्रकार के संग्रहों का परित्याग किये हुए है ऐसे मोक्षार्थी मुमुक्षुजन भी जब ग्रह नक्षत्रों की गणना
करने वाले दैवज्ञ से अपने भूत भविष्य की जिज्ञासा करते है तो फिर जो दिन रात अर्थचिन्ता में प्रयास रत रहते
है उनके विषय में क्या कहा जाए । अर्थात् वे ज्योतिर्विद के पास जाए तो इसमें क्या आश्चर्य ।

वनं समाश्रिताः येअ्पि निर्ममा निष्परिग्रहाः ।
अपि ते परिपृच्छन्ति ज्योतिषां गतिकोविदम् ।।

जिन्होंने गृहस्थाश्रम का परित्याग कर वन का ही आश्रय ग्रहण किया है जो अहंता ममता से रहित और
आसक्ति से शून्य है वे भी ग्रह नक्षत्रों की गति को जानने वाले ज्योतिरवेता से अपने विषय में प्रश्न पूछते हैं

ज्योतिष शास्त्र मूर्धन्य है

यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा ।
तद्वद्वेदाङ्गशास्त्राणां ज्यौतिषं मूर्धनि स्थितम् ।।

जिस प्रकार मयूरों की शिखा उनके शिर देश में स्थित रहती है और जिस प्रकार नागों की मणियां भी
उनके शिरस्थ देश में रहती हैं उसी प्रकार वेदाङ्गों (शिक्षा ,कल्प ,निरुक्त,व्याकरण,छंद ,तथा ज्योतिष ) में
ज्योतिष शास्त्र में सबसे ऊपर स्थित है

दिव्यं चार्क्षग्रहाणां च दर्शितं ज्ञानमुत्तमम् ।
विज्ञेयार्कादिलोकेषु स्थानं प्रापनोति शाश्वतम् ।।

( सूर्यवतार पुरुष ने मयासुर से कहा ) मैने ग्रह तथा नक्षत्र सम्बन्धी दिव्य उत्तम ज्ञान तुम्हें उपदिष्ट किया ।
इसके ज्ञान से व्यक्ति सूर्य आदि लोकों में शाश्वत स्थान प्राप्त कर लेता है ।

परलोक में ज्योतिष शास्त्र से सद्गति

न सांवत्सरपाठी च नरकेषूपपद्यते ।
ब्रह्मलोके प्रतिष्ठां च लभते दैवचिन्तकः ।।

ज्योतिर्विद्या के जानने वाले को नरकादि लोकों की प्राप्ति नही होती है दैव का विचार करने वाला
ज्योतिरवेता ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ।

अन्यानि शास्त्राणि विनोदमात्रं न
न किन्चिदोषां भुवि दृष्टमस्ति ।
चिकित्सितज्योतिषमन्त्रवादाः
पदे पदे प्रत्ययमावहन्ति ।।

अन्य शास्त्र तो विनोदमात्र है इनका इस पृथ्वी पर कोई दृष्टांत दिखाई नही देता किन्तु चिकित्साशास्त्र
ज्योतिष शास्त्र तो पद पद पर विश्वास दिलाने वाला है

ज्योतिषचक्रे तु लोकस्य सर्वस्योक्तं शुभाशुभम् ।
ज्योतिर्ज्ञानं तु यो वेद स याति परमां गतिम् ।।

ज्योतिषचक्र में संसार के सभी जनों का शुभाशुभ विद्यमान रहता है जो ज्योतिष शास्त्र को जानता है वह
परमगति को प्राप्त होता है!

सभी शास्त्रों में श्रेष्ठ

अप्रत्यक्षणि शास्त्राणि विवादस्तेषु केवलम् ।
प्रत्यक्षं ज्यौतिषं शास्त्रं चन्द्रार्को यत्र साक्षिणौ ।।

अन्य शास्त्र अप्रत्यक्ष है इसलिए उनमें तो विवाद ही रहता है किंतु ज्योतिष शास्त्र प्रत्यक्षशास्त्र है और
इसके साक्षी सूर्य और चंद्रमा है ।


ग्रहधीनं जगत्सर्वं ग्रहाधीनाः नरावराः ।
कालज्ञानं ग्रहाधीनं ग्रहाः कर्मफलप्रदाः ।।


ग्रहों के अधीन ही सभी श्रेष्ठ मनुष्य होते है काल का ज्ञान भी ग्रहों के अधीन है और ग्रह ही कर्मो के फल
को देने वाले होते हैं ।

यदुपचितमन्यजन्मनि शुभाशुभं तस्य कर्मणः पक्तिम् ।
व्यन्जयति शास्त्रमेतत् तमसि द्रव्याणि दीप इव ।।

पूर्व जन्म में प्राणियों ने जो शुभ अथवा कर्म किया है उसके परिणाम को तथा उस परिणाम का समय कब
इस बात को ज्योतिषशास्त्र उसी प्रकार बता देता है जैसे अंधेरे में दीपक पदार्थों को दिखा देता है ।

यथा काष्ठमयः सिंहो यथा चित्रमयो नृपः ।
तथा वेदाद्यधीतोअ्पि ज्योतिः शास्त्रं विना द्विजः ।।

जिस प्रकार काष्ठ से निर्मित सिहं तथा चित्र में बनाया गया राजा प्राणविहीन होने से कुछ भी करने में
निष्फल होता है उसी प्रकार वेद आदि शास्त्रो का ज्ञाता द्विज भी ज्योतिष शास्त्र के ज्ञान के बिना निष्फल
ही होता है ।

छः वेदांग

छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोअ्थ पठयते ,
ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते ।
शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम् ,
तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते ।।


वेदरूपी पुरुष के छंदशास्त्र पैर है दोनों हाथ कल्प है ज्योतिष शास्त्र नेत्र है निरुक्त श्रोत्र है शिक्षा को वेद की
नासिका तथा मुख को व्याकरण कहा गया है अतः वेदांगों के ज्ञान के साथ ही वेद का अध्ययन करने
वाला ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है

होराशास्त्रमिदं सर्वं श्रद्धाविनयसंयुतः ।
श्रुत्वा गुरुमुखादेव बुद्धिमानवलोक्य च ।।
यो जानाति स शास्त्रार्थं सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
श्रावयेद्दर्शयेद् विद्वानन्यो गर्गो द्विजोत्तमः ।।
सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोकं स गच्छति ।
वेदेभ्यश्च समुद्धृत्य ब्रह्मा प्रोवाच विस्तृतम् ।।
शास्त्रमाद्य तदेवेदं वेदाङ्गं वेदचक्षुषी ।।

जो बुद्धिमान इस होराशास्त्र को श्रद्धा विनय से युक्त होकर गुरु के मुख से सुनकर और ठीक से
समझकर शास्त्र के अर्थ को जानता है वह सभी पापों से छूट जाता हज और ऐसा विद्वान जो दूसरों को
सुनता है और उपदिष्ट करता है वह द्विजोत्तम दूसरे गर्ग के समान होता है वह सभी पापों से मुक्त होकर
ब्रह्मलोक प्राप्त करता है यही वेदांग और वेद का नेत्ररूपी आद्यशास्त्र है जिसे वेदों से निकलकर ब्रह्मा जी
ने विस्तारपूर्वक गर्ग ऋषि को बताया है ।

अत्र सुखं तत्र मोक्षं

एतद् बुद्ध्व सम्यगाप्नोति नूनं
धर्मं चार्थं मोक्ष्यमग्रथं यशश्च ।।


इस ज्योतिष शास्त्र को भलीभांति जान लेने से व्यक्ति निश्चित ही इस लोक में धर्म ,अर्थ सर्वपूज्यता तथा
यश प्राप्त करता है और मृत्यु के अनन्तर उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है ।

यो ज्योतिषं वेत्ति नरः स सम्यक्
धर्मार्थकामाँल्लभते यशश्च ।

जो इस ज्योतिष शास्त्र को सम्यक् रीति से जानता है वह धर्म ,अर्थ ,काम तथा यश प्राप्त करता है ।

सोमसूर्यस्तृचरितं विद्वान् वेद विदश्नुते ।
सोमसूर्यस्तृचरितं लोकं लोके च सन्ततिम् ।।

जो विद्वान् चन्द्र सूर्य और नक्षत्र के चरित्र को जानता है वह विद्वान् सोम सूर्य तथा नक्षत्र से प्रचारित
प्रसिद्ध चन्द्रलोक सूर्यलोक ओर नक्षत्रलोक को प्राप्त करता है अर्थात् वहां जाकर वहाँ के सुखों का
उपभोग करता है और संसार में पुत्र पौत्रादिको को प्राप्त करता है!

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