ज्योतिष

कालमान


१४ – अंतिम चौदह वें अध्याय के आरम्भ में नौ प्रकार के कालमानों का वर्णन हुआ है – १) – ब्रह्मा ,२)दैव् ,३)
पित्र्य , ४) प्राजापत्य , ५- बार्हस्पत्य , ६ – सौर , ७ – सावन ,८ – चांद्र तथा ,९ – नाक्षत्रमान । इसमें से केवल
सौर , चांद्र नाक्षत्रिक तथा सावन – इन चार मानों का ही व्यवहार होता है ।

षट्यशब्द जानने के लिए
बार्हस्पत्यमान समझना चाहिए । इन सभी कालमानों के ज्ञान की विधि तथा उन मानों से क्या क्या
व्यवहार लेना चाहिए – यह बताया गया है , जैसे दिन रात्रि का परिणाम , उत्तर तथा दक्षिण अयन , सक्रांति
, सक्रांति का पुण्यकाल आदि का व्यवहार सौर मास से जाना जाता है ।
चान्द्रमास से तिथि , करण , विवाह क्षोरादिकर्म , व्रत , उपवास , यात्रा आदि का विचार करना चाहिए आगे
भी इसी प्रकार विस्तृतं विवेचन है । अंत में ग्रन्थ की फलश्रुति है ।

अन्य परिचय

इस प्रकार सूर्यसिद्धान्त नामक इस ग्रन्थ में खगोल तथा भूगोल ज्ञान , अंकगणित ,बीजगणित , तथा
रेखागणित के मूल सिद्धांत बताए गए है । ज्या , कोटिज़्या , त्रिज्या , धनु , आदि त्रिकोणमिति का पूर्ण
गणित वर्णित है तथा दिक कालज्ञान और नक्षत्रों की गतियों का पूर्ण वर्णन है ।

आज भारतवर्ष के
अधिकांश पंचांग इसी सूर्यसिद्धान्त के आधार पर बनते हैं । गणेशदेवज्ञ का ग्रहलाघव तथा मकरन्दीय
सारणियाँ इसी सिद्धान्त की पोषक हैं । दैवज्ञ जगत् में इस ग्रन्थ का विशेष समादर है ।

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