ज्योतिष

सूर्यसिद्धान्त की टिकाएं –

यह ग्रन्थ अत्यंत क्लिष्ट है । इसके तत्त्व को समझने के लिए संस्कृत , हिंदी ,
अंग्रेजी आदि में कई टिकाएं इस पर हुई हैं । प्रसिद्ध संस्कृत टीकाओं में आचार्य रंगनाथ की
गुढ़ार्थप्रकाशिका , नृसिंह दैवज्ञ का सौर भाष्य , विश्वनाथदेवज्ञ की सोदाहरणगहनार्थप्रकाशिका तथा
दादाभाई की किरणावली मुख्य हैं ।
परम सूर्य भक्त शिल्पशास्त्री मयासुर का संक्षिप्त परिचय
सूर्यसिद्धान्त ग्रन्थ के प्रारम्भ में सूर्यावतार पुरुष के द्वारा मय को सम्पूर्ण ग्रह नक्षत्रों का ज्ञान कराने वाली
ज्योतिषविद्या की चर्चा आयी है अतः संक्षेप में दैत्यश्रेष्ठ मय का चरित यहाँ प्रस्तुत है –

मय शिल्पी का परिचय


जिस प्रकार देवशिल्पी के रूप में विश्वकर्मा की प्रसिद्धि है , वैसे ही असुरशिल्पी के रूप में असुरश्रेष्ठ मय
की प्रतिष्ठा है । शिल्पकला , वास्तुकला , स्थापत्य , चित्रकला तथा खगोल ज्ञान के आचार्य होने के कारण
असुरलोक के प्रसाद , उद्यान तथा असुरों की सभाओं के निर्माता मय ही है ।

इनके द्वारा विरचित ,
मयशिल्पम , नामक शिल्पशास्त्रीय ग्रन्थ अत्यंत प्राचीन काल से भारत में समादृत होता चला आ रहा है ।
महर्षि वाल्मीकि ने सुंदरकांड , युद्धकाण्ड और उत्तरकाण्ड के लगभग पचास अध्यायों के अंतर्गत
मयद्वारा निर्मित लंकापुरी के वर्णन में मय के विचित्र शिल्पकोशल का परिचय दिया है ।

असुरों की नगरी
भोगवती के निर्माता मय ही हैं । मय केवल दैत्यों के ही नहीं , प्रत्युत देवताओं , मनुष्यों ओर यहाँ तक कि
भगवान् कृष्ण और युधिष्ठर के कहने पर इंद्रप्रस्थ नगरी तथा युधिष्ठर के दिव्य सभा के निर्माता मय ही हैं ,
उस सभाभवन का फर्श इतना विलक्षण था कि स्थल जल के समान और जल स्थल के समान प्रतीत
होता था , इसी कारण दुर्योधन जैसा शूर एवं बुद्धिमान् भी उसे देखकर भ्रम में पड़ गया ।

पौराणिक संदर्भ

पौराणिक कथानकों के अनुसार मय कश्यप पत्नी द्नु के पुत्र हैं । इनकी पत्नी का नाम हेमा है । मन्दोदरी
नाम की इनकी सुलक्षणा कन्या का विवाह रावण के साथ हुआ था ।

सूर्य – चन्द्रमा की भांति आकाश में
विचरण करने वाले तीन पुरों के निर्माता मय हैं जिनका भेदन करने की शक्ति केवल भगवान् शिव में थी ,
इसलिए वे त्रिपुरारी कहलाये । शिल्पशास्त्रों के ग्रन्थो में आद्य आचार्य के रूप में मय की वंदना की गई है ।

मत्स्यपुराण में वास्तुविद्या के अठारह आचार्य परिगणित हैं , उनमें मय का विशिष्ट स्थान है । जैसे मय
शिल्पशास्त्र में निपुण थे , वैसे ही भगवान् सूर्य की कृपा से ज्योतिषं विषयक उनका ग्रहगनीतिय ज्ञान भी
अपूर्व था ।

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