ज्योतिष

दैवज्ञ के लक्षण

शान्तो विनीतः शुद्धात्मा देवब्राह्मणपूजकः ।
विमुखः परनिन्दासु वेदपाठी जितेन्द्रियः ।।
देवताराधनासक्तः स्वरशास्त्रविशारदः ।
सिद्धान्तसंहितावेत्ता जातके च कृतभ्रमः ।।
प्रश्ननज्ञः शकुनज्ञश्च प्रशस्तो गणकः स्मृतः ।
प्रमाणं वचनं तस्य भवत्येव न संशयः ।।

ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता को चाहिए कि वह शांत स्वभाव वाला विनय से सम्पन्न ,पवित्र अन्तः करण वाला
,देवताओं तथा ब्राह्मणों में श्रद्धा रखने वाला ,परनिंदा से विमुख रहने वाला वेद का परायण करने वाला
तथा जितेन्द्रिय हो । वह देवताओं की आराधना में परायण रहने वाला और सूर्य तथा चन्द्र स्वरूप का ज्ञान
कराने वाला स्वरोदयशास्त्र का पारगामी विद्वान हो । वह ज्योतिष शास्त्र के सिद्धान्त एवं सहिंता स्कंध
का ज्ञाता हो तथा उसने जतकशास्त्र में पर्याप्त श्रम किया हो । प्रश्न विद्या कि जानकारी रखने वाला और
शकुन शास्त्र में प्रवीण इस प्रकार का व्यक्ति श्रेष्ठ गणक कहा गया है उसका कहा हुआ वचन प्रमाणिक
होता है इसमें कोई संशय नही ।

ज्योतिर्विद के अन्य लक्षण

ग्रन्थतश्चार्थतश्चैव कृत्स्नं जानाति यो द्विजः ।
अग्रभुक् स भवेच्छ्राद्धे पूजितः पक्तिपावनः ।।
नासांवत्सरिके देशे वस्तव्यं भूतिमिच्छता ।
चक्षुर्भूतो हि यत्रैष पापं तत्र न.विद्यते ।।
मुहुर्त तिथिनक्षत्रमृतवश्चायने तथा ।
सर्वाण्येवाकुलानि स्युर्न स्यात्सांवत्सरो यदि ।
कृतस्नाङ्गोकुशलं होरागणितनैष्ठिकम् ।।
यो न पूज्यते राजा स नाशमुपगच्छति ।।
अप्रदीपा यथा रात्रिरनादित्यं यथा नमः ।
तथासांवत्सरो राजा भ्रमत्यन्ध इवाध्वनि ।।
तस्माद्राज्ञामिगन्तव्यो विद्वान् सांवत्सरोअ्ग्रणीः ।
जयं यशः श्रियं भोगान् श्रेयश्च समभीप्सता ।।

जो द्विज इस ज्योतिष शास्त्र को ग्रन्थ के अनुसार अथवा अर्थ के अनुरूप भलीभांति जान लेता है, वह
श्राद्ध में प्रथम भोजन करने योग्य पंक्तिपावन तथा सर्वत्र पूज्य होता है! कल्याणकामी व्यक्ति को ऐसे देश
मे निवास नही करना चाहिए ,जंहा ज्योतिर्विद न रहता हो ,क्योंकि सब बातों का नेत्ररूप देवज्ञ जंहा रहता है
वँहा पाप नही रहता । यदि ग्रह -नक्षत्रों की गणना करने वाला ज्योतिर्विद न हो तो मुहूर्त तिथि नक्षत्र ऋतुएँ
तथा अयन ये सभी व्याकुल हो जाएं ।

सम्पूर्ण अंगों तथा उपांगों सहित वेदशास्त्र में कुशल एवं होराशास्त्र
तथा गणितशास्त्र में परिनिष्ठित देवज्ञ की जो राजा सेवा पूजा नही करता है वह विनाश को प्राप्त होता है
जिस प्रकार दीपक से विहीन रात्रि तथा सूर्य से रहित आकाश होता है वह अंधे की भांति मार्ग में इधर उधर
भटकता है, अतः विजय यश लक्ष्मी उत्तम भोग तथा कल्याण की अभिलाषा रखने वाले राजा को विद्वान्
तथा श्रेष्ठ ज्योतिर्विद के समीप में जाना चाहिए ,अर्थात् उसके परामर्श के अनुसार ही कार्य करना चाहिए ।

गणितं जातकं शाखां यो वेत्ति द्विजपुङ्गवः ।
त्रिस्कन्धज्ञो विनिर्दिष्टः संहितापारगश्च सः ।।

जो द्विज श्रेष्ठ गणितस्कन्ध तथा जातकशास्त्र को सम्यक रूप से जानता है और संहितास्कन्ध का पारगामी
विद्वान् है वह त्रिस्कन्ध कहा गया है ।

ज्योतिषी केसा हो

गणितेषु प्रवीणो यः शब्दशास्त्रे कृतश्रमः
न्यायविद् बुद्धिमान् देशदिक्कालज्ञो जितेन्द्रियः ।।
ऊहापोहपदुहोरास्कन्धश्रवणसम्मतः ।
मैत्रेय सत्यतां याति तस्य वाक्यं न संशयः ।।

हे मैत्रेय जो गणित में प्रवीण हो व्याकरणशास्त्र में जिसने खूब श्रम किया हो ,न्यायशास्त्र को जानने वाला
हो वुद्धिमान हो देश दिक का ज्ञान रखने वाला हो ,तर्क वितर्क करने में अत्यंत पटु हो और होराशास्त्र के
श्रवण में जिसकी विशेष अभिरुचि हो उसका कहा हुआ सब सत्य होता है इसमें कोई संशय नही है ।

त्रिस्कन्धज्ञो दर्शनीयः श्रौतस्मार्तक्रियापरः ।
निर्दाम्भिकः सत्यवादी दैवज्ञो दैववित्स्थिरः ।।


दैवज्ञ सिद्धान्त संहितां तथा होरा तीनों स्कंधों को जानने वाला दर्शन करने योग्य श्रुति स्मृति के अनुसार आचरण करने वाला तथा पाखंड से रहित तीनों स्कंदों सिद्धांत,संहिता,होरा को जानने वाला होता है!

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