दस महाविद्या और उनकी उपासना

दश महाविद्या के प्रादुर्भाव के विषय में पुराणों में विभन्न कथाएं उपलब्ध होती है यहां पर प्रामाणिक तथा संग्रहित जानकारियां उपासकों अथवा पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहें हैं !

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महाविद्या प्रादुर्भाव

Ideaz unlimited: Das Mahavidya दस महाविद्या की ...


पराम्बा माँ भगवती की दश महाविद्या प्रादुर्भाव तथा उपासना की विधियां जानने की उत्कंठा प्रत्येक साधक के मन में रहती है,माँ के आशीर्वाद से ही उनकी उपासना करने का सौभाग्य इस मानव जीवन में प्राप्त होता है! महाशक्ति विद्या और अविद्या दोनों ही रूपों में विद्यमान है ।

अविद्या रूप में वे प्राणियों के मोह का कारण
है तो विद्या रूप में मुक्ति का । शास्त्र ओर पुराण उन्हें विद्या के रूप में ओर परमपुरुष को विद्यापति के रुप
में मानते हैं ।

वेद तथा अन्यान्य शास्त्रों के रूप में महाविद्या का प्रकट रूप और आगामादि के रूप में विद्वानों
एवं साधकों द्वारा गुप्तरूप में संकेतित है । वैष्णवी ओर शाम्भवी भेद से दोनों की ही शरणगति परम् लाभ
में हेतु है ।

आगमशास्त्र में यद्यपि गुह्य गुरुमुखगम्य अनेक विद्याओं के रूप स्तव और मंत्रादिकों का
विधान है । , तथापि उनमें दस महाविद्याओं की प्रधानता तो स्पष्ट प्रतिपादित है , जो जगन्माता भगवती से
अभिन्न हैं –

साक्षाद् विद्यैव सा न ततो भिन्ना जगन्माता ।
अस्याः स्वाभिन्नत्वं श्रीविद्याया रहस्यार्थः ।।


महाविद्याओं का प्रादुर्भाव


दस महाविद्याओं का सम्बंध परम्परागत सती , शिवा और पार्वती से है । ये ही अन्यत्र नवदुर्गा , शक्ति ,
चामुण्डा , विष्णुप्रिया , आदि नामों से पूजित ओर अर्जित होती है । देवीपुराण में कथा आती है कि
दक्षप्रजापति ने अपने यज्ञ में शिव को आमंत्रित नही किया ।

सती ने शिव से उस यज्ञ में जाने की अनुमति
मांगी । शिव ने अनुचित बताकर उन्हें जाने से रोका , पर सती अपने निश्चय पर अटल रही । उन्होंने कहा –
मैं प्रजापति के यज्ञ में अवश्य जाऊँगी और वहाँ या तो अपने प्राणेश्वर देवाधिदेव के लिए यज्ञभाग प्राप्त
करूंगी या यज्ञ को ही नष्ट कर दूँगी ।

यह कहते हुए सती के नेत्र लाल हो गए । वे शिव को उग्र दृष्टि से
देखने लगी । उनके अधर फड़कने लगे , वर्ण कृष्ण हो गया । क्रोधाग्नि से दग्धशरीर महाभयानक एवं उग्र
दिखने लगा । उस समय महामाया का विग्रह प्रचण्ड तेज से तमतमा रहा था ।

शरीर वृद्धावस्था को
सम्प्राप्त सा , केशराशि बिखरी हुई , चार भुजाओं से सुशोभित वे [महाविद्या] महादेवी पराक्रम की वर्षा करती सी
प्रतीत हो रही थी । कालाग्नि के समान महाभयानक रूप में देवी मुण्डमाला पहने हुई थी और उनकी
भयानक जिह्वा बाहर निकली हुई थी । शीश पर अर्धचन्द्र सुशोभित था और उनका सम्पूर्ण व्यक्तित्व
विकराल लग रहा था । वे बार बार विकट हुंकार कर रही थी ।

शिव का भयभीत होना

देवी का यह स्वरूप साक्षात् महादेव के लिए
भी भयप्रद और प्रचण्ड था । उस समय उनका श्रीविग्रह करोड़ों मध्याह्न के सूर्यों के समान तेज सम्पन्न था
और वे बार बार अट्टहास कर रहीं थी । देवी के इस विकराल महाभयानक रूप को देखकर शिव भाग चले ।

भागते हुए रुद्र को दसों दिशाओं में रोकने के लिए देवी ने अपनी अंगभूता दस देवियों को प्रकट किया ।
देवी की ये स्वरूपा शक्तियां ही दस महाविद्या हैं ।

जिनके नाम हैं – काली , तारा , छिन्नमस्ता , धूमावती ,
बंगलामुखी , कमला , त्रिपुरभैरवी , भुवनेश्वरी , त्रिपुरसुन्दरी , और मातंगी ।

शिव ने सती से इन महाविद्याओं का जब परिचय पूछा , तब सती ने स्वयं इसकी व्याख्या करके उन्हें
बताया –
येयं ते पुरतः कृष्णा सा काली भीमलोचना ।
श्यामवर्णा च या देवी स्वयमूर्ध्वं व्यवस्थिति ।।
सेयं तारा महाविद्या महाकालस्वरूपिणी ।
सव्येतरेयं या देवी विशीर्षातिभयप्रदा ।।
इयं देवी छिन्नमस्ता महाविद्या महामते ।
वामे तवेयं या देवी सा शम्भो भुवनेश्वरी ।।
पृष्ठतस्तव या.देवी बगला शत्रुसूदिनी ।
वह्निकोणे तवेयं या विधवारूपधारिणी ।।
सेयं धूमावती देवी महाविद्या महेश्वरी ।
नैर्ऋत्यां तव या देवी सेयं त्रिपुरसुन्दरी ।।
वायौ या ते महाविद्या सेयं मतङ्गकन्यका ।
ऐशान्यां षोडशी देवी महाविद्या महेश्वरी ।।
अहं तु भैरवी भीमा शम्भो मा त्वं भयं कुरु ।
एताः सर्वाः प्रकृष्टास्तु मूर्तयो बहुमूर्तिषु ।।

शक्ति द्वारा परिचय

शम्भो ! आपके सम्मुख जो यह कृष्णवर्णा एवं भयंकर नेत्रों वाली देवी स्थित है वे काली है । जो श्यामवर्णा
वाली देवी स्वयं ऊर्ध्वभाग में स्थित है , ये महाकाल स्वरूपिणी महाविद्या तारा हैं । महामते ।

बायीं ओर जो
ये अत्यंत भयदायिनी मस्तकरहित देवी है , ये महामाया छिन्नमस्ता महाविद्या है । शम्भो , ! आपके वाम भाग में जो ये
देवी है वे भुवनेश्वरी हैं । आपके पृष्ठभाग में जो देवी हैं वे ‘ शत्रुसंहारिणी बगला हैं ।

आपके अग्निकोण में
जो ये विधवा का रूप धारण करने वाली देवी है वे महेश्वरी महाविद्या ‘ धूमवती ‘ है । आपके नैऋत्यकोण
में जो देवी है वे त्रिपुरसुन्दरी है । आपके वायव्यकोण में जो देवी हैं , ये मतङ्गकन्या महाविद्या मातङ्गी हैं ।


आपके ईशान कोण में महेश्वरी महाविद्या षोडशी देवी हैं । शम्भो । मैं भयंकर रूप वाली , भैरवी , हूँ । आप
भय मत करें । ये सभी मूर्तियां बहुत सी मूर्तियों में प्रकृष्ट हैं ।शक्ति स्वरूपा माँ जगदम्बा के रहस्यों की जानकारी के लिए यहां क्लिक करें

सर्व शक्ति स्वरूपा के रहस्य

महाकाली की महिमा

महाभागवत के इस आख्यान से प्रतीत होता है कि महाकाली ही मुलरूपा मुख्य महाविद्या हैं । और उन्हीं के उग्र और
सौम्य दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली ये दस महाविद्याएँ हैं । दूसरे शब्दों में महाकाली के दशधा
प्रधान रूपों को ही दस महाविद्या कहा जाता है ।

सर्वविद्यापति शिव की शक्तियां ये दस महाविद्याएँ लोक
कर शास्त्र में अनेक रूपों में पूजित हुई , पर इनके दस रूप प्रमुख हो गए । ये ही महाविद्याएँ साधकों का
परम धन हैं, जो सिद्ध होकर अनन्त सिद्धियों और अनन्त का साक्षात्कार कराने में समर्थ है ।


महाविद्याओं के क्रम भेद तो प्राप्त होते हैं , पर काली की प्राथमिकता सर्वत्र देखी जाती है । यों भी
दार्शनिक दृष्टि से कालतत्व की प्रधानता सर्वोपरि है । इसलिए मूलतः महाकाली या काली अनेक रूपों
विद्याओं में आदि है ।

अन्य

महाविद्या और उनकी विद्यामय विभूतियाँ महाविद्याएँ हैं । ऐसा लगता है कि महाकाल की
प्रियतमा काली अपने दक्षिण और वाम रूपों में दस महाविद्याओं के रूप में विख्यात हुई और उनके
विकराल तथा सौम्य रूप ही विभिन्न नामरूपों के साथ दस महाविद्याओं के रूप में अनादिकाल से अर्चित
हो रहे हैं ।

ये रूप अपनी उपासना , मन्त्र और दीक्षाओं के भेद से अनेक होते हुए भी मूलतः एक ही है ।
अधिकारी भेद से अलग अलग रूप और उपासना स्वरूप प्रचलित है ।
प्रकाश और विमर्श , शिवशक्त्यात्मक तत्त्व का अखिल विस्तार और लय सब कुछ शक्ति का ही लीला
विलास है ।

सृष्टि में शक्ति और संहार में शिव की प्रधानता दृष्ट जैसे अमा और पूर्णिमा दोनों दो भासती है
, पर दोनों की तत्त्वतः एकात्मता ओर दोनों एक दूसरे के कारण परिणामी हैं , वैसे ही दस महाविद्याओं के
रौद्र और सौम्य रूपों को भी समझना चाहिए ।

काली , तारा , छिन्नमस्ता , बगला और धूमवती विद्यास्वरूप
भगवतीं के प्रकट , कठोर किन्तु अप्रकट करुण रूप हैं तो भुवनेश्वरी षोडशी , त्रिपुरभैरवी , मातङ्गी , और
कमला विद्यायों के सौम्य रूप हैं । रौद्र के सम्यक साक्षात्कार के बिना माधुर्य को नही जाना जा सकता
और माधुर्य के अभाव में रुद्र की सम्यक परिकल्पना नही की जा सकती ।

स्वरूप कथन


यद्यपि दस महाविद्याओं का स्वरूप अचिन्त्य है , तथापि शाखाचन्द्रन्याय से उपासक , स्मृतियाँ और
पराम्बा के चरणानुगामी इस विषय में कुछ निर्वचन अवश्य कर लेते हैं ।

इस दृष्टि से काली तत्त्व प्राथमिक
महाविद्या शक्ति है । निर्गुण ब्रह्म की पर्याय इस महाशक्ति को तांत्रिक ग्रन्थों में विशेष प्रधानता दी गयी है वास्तव में
इन्हीं के दो रूपों का विस्तार ही दस महाविद्याओं के स्वरूप हैं महानिर्गुन कि अधिष्ठात्री शक्ति होने के
कारण ही इनकी उपमा अंधकार से दी जाती है ।

महासगुण होकर वे ‘ सुंदरी ‘ कहलाती है तो महानिर्गुण
होकर काली । तत्त्वतः सब एक हैं , भेद केवल प्रतीतिमात्र का है , कादी और हादी विद्यायों के रूप में भी

एक ही श्रीविद्या क्रमशः काली से प्रारम्भ होकर उपास्या होती है । एकाको ‘ संहार क्रम ‘ नाम दिया जाता है!

महालक्ष्मी


देवीभागवत आदि शक्ति ग्रन्थों में महाविद्या महालक्ष्मी या शक्तिबीज को मुख्य प्राधानिक बताने का रहस्य यह है
कि इसमें हादी विद्या की क्रमयोजना स्वीकार की गई है और तन्त्रों विशेषकर अत्यंत गोपनीय तन्त्रों में
काली को प्रधान माना गया है ।

तात्त्विक दृष्टि से यहाँ भी भेदबुद्धि की संभावना नहीं है । सगुनहिं
अगुनहिं नहिं कछु भेदा
, का तर्क दोनों से अभिन्न सिद्ध करता है ।
बृहत्रीलतन्त्र में कहा गया है कि रक्त और कृष्णभेद से काली ही दो रूपों में अधिष्ठित हैं ।

कृष्णा
का नाम , दक्षिणा , है तो रक्तवर्णा का नाम , सुंदरी महाविद्या , –
विद्या हि द्विविधा प्रोक्ता कृष्णा रक्ता प्रभेदतः ।
कृष्णा तु दक्षिणा प्रोक्ता रक्ता तु सुन्दरी मता ।।

उपासना के दो भेद

महाविद्या उपासना के भेद से दोनों में द्वैत है , पर तत्त्वदृष्टि से अद्वैत है । वास्तव में काली और भुवनेश्वरी दोनों मूल
प्रकृति के अव्यक्त ओर व्यक्त रूप हैं । काली से कमालातक की यात्रा दस सोपानों में अथवा दस स्तरों में
पूर्ण होती है । दस महाविद्याओं का स्वरूप इसी रहस्य का परिणाम है ।

दस महाविद्याओं की उपासना में सृष्टि क्रम की उपासना लोकग्राह्य है । इसमें भुवनेश्वरी को प्रधान माना
गया है । यही समस्त विकृतियों की प्रधान प्रकृति है ।

देवी भागवत के अनुसार सदाशिव फलक है तथा
ब्रह्मा विष्णु , रुद्र और ईश्वर , उस फलक या श्रीमंच के पाये हैं । इस श्रीमंच पर भुवनेश्वरी भुवनेश्वर के
साथ विद्यमान है । सात करोड़ मन्त्र इनकी आराधना में लगे हुए हैं ।

विद्वानों का कथन है कि निर्विशेष ब्रह्म
ही स्वशक्ति विलास के द्वारा ब्रह्मा , विष्णु , आदि पंच आख्याओं को प्राप्त होकर अपनी शक्तियों के
सान्निध्य से सृष्टि , स्थिति , लय , संग्रह , तथा अनुग्रह रूप पंच कृत्यों को सम्पादित करते हैं ।

वह निर्विशेष
तत्त्व परमपुरुष , पद वाच्य है और उसकी स्वरूपभूत अभिन्न शक्ति ही है भुवनेश्वरी ।अन्य साधनाओं की जानकारी के लिए लिंक पर क्लिक करें अन्य साधनायें

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