भगवान शिव का ध्यान

ध्यानं


वन्देअ्हं सकलं कलंक-रोहितं स्थाणोर्मुखं पश्चिमम् ।
शुभं त्रिलोचनं नाम्ना सद्योजातं शिव पदम् ।।

वामदेवं सुवर्णाभं दिव्यास्त्रगण सेवितम् ।
अजन्मानमुमाकान्तं वन्देअ्हं हि उत्तरं मुखम् ।।

बालकं वर्णमारक्तं पुरुषं च तडित्प्रभम् ।
दिव्यं पिङ्गजटाधारं वन्देअ्हं पूर्वादिक मुखम् ।।

मधयाण्हार्क समप्रभं शशिधरं भीमाट्टहासोज्जवलं,
त्र्यक्षं पन्नगभूषणं शिखि शिखाश्मश्रु स्फुरन्मूर्धजम् ।
हस्ताब्जैः त्रिशिखं समुदगरमसिं शक्तिं दधानं विभुं
दंष्ट्राभीम चतुर्मुखं पशुपतिं दिव्यास्त्र रूपं शंकरं स्मरेत ।।

अर्थात् –

जिनकी प्रभा मध्याण्ह सूर्य के समान दिव्य रूप में मासित हो रही है जिनके मस्तक पर चन्द्रमा
विराजित है जिनका मुख प्रचण्ड अट्टहास से उद्भासित हो रहा है सर्प जिनके आभूषण है तथा चन्द्र, सूर्य,
अग्नि ये तीनों जिनके नेत्र है जिनके शरीर की जटाएं मोर पंख के समान शोभायमान हो रही है जिनके
करकमलों में त्रिशूल ,मुद्गर ,तलवार और शक्ति को धारण कर रहा

नीलकंठ स्तुति

श्री नीलकण्ठः बालर्कायुततेजसं घृतजटाजूटेन्दु खण्डोज्जवलं,
नागेन्द्रैः कृतभूषणं जपवटीं शूलं कपालं करैः ।
खट्वाङ्गं दधतं त्रिनेत्रविलसतपंचाननं सुन्दरं,
व्याघ्रत्वम्परिधानमब्जनिलयं श्री नीलकण्ठं भजे ।।

नीलभ्रवर्णमोंकारघोरं घोरदंष्ट्र्कम् ।

दंष्ट्रं करालमत्ययुग्रं वन्देअ्हं दक्षिणं मुखम् ।।

वन्दे तामसवर्जितेन मनसा सूक्ष्मातिसूक्ष्मं परं
शान्तं पंचमीश्वरस्य वदनं ख व्यापि तेजोमयम् ।
ईशानं सूक्ष्ममव्यक्तं तेजः पुंज परायणम् ,
अमृतस्त्रावि चिद्रुपं वन्देअ्हं पन्चमं मुखम्।।

मृत्युंजय ध्यान

हस्ताभोज युगस्थ कुम्भ युगलाद् उध्दृत्य तोयं शिरः ,
सिन्चन्तं करयोर्युगेनदधतं स्वाङ्केसकुम्भौ करौ ।
अक्षस्त्रङ्ग मृगहहस्तमम्बु जगतं मूर्धस्थचन्द्रं स्त्रवत् ,
पीयुषार्द्रतनुं भजे सगिरिजं मृत्युजंयं त्र्यम्बकम् ।।

मैं त्रयम्बक भगवान का ध्यान करता हूँ जिनके आठ हाथ है । अपने ऊपर के दोनों करकमलों से दो घडों
को उठाकर एवं उसके नीचे के दो हाथों से जल को अपने शरीर पर उंडेल रहे हैं ।सबसे नीचे के दो हाथों में
भी दो घड़े लेकर अपनी गोद में रख लिए है ,शेष दो हाथों में रुद्राक्ष की माला तथा मृगी मुद्रा धारण किये
हुए हैं ।वे कमलासन पर वैठे हुए हैं और उनके शरीरस्थ चन्द्र से सतत अमृत वृष्टि होने से उनका देह भी
भीगा हुआ है । उनके वामांग में गिरिजानंदिनी भगवती उमा विराजमान है तीन नेत्रों से सुशोभित मृत्युंजय
भगवान शिव का हम ध्यान करते है ।

शंकर ध्यान

वन्दे वदन तुष्टमान समति प्रेमप्रियं प्रमेदं,
पूर्णं पूर्णकरं प्रपूर्ण निखिलैश्वरर्यैक वासं शिवम् ।
सत्यं सत्यमयं त्रिसत्याविभवं सत्याप्रियं सत्यदं,
विष्णु ब्रह्मनुतं स्वकीय कृपयोपात्ताकृतिं शंकरम् ।।

अर्थात् वन्दना करने से जिसका मन प्रसन्न होता है जिन्हें प्रेम अत्यंत प्यारा है जो प्रेम प्रदान करतें है
पूर्णानंदमय भक्तों की अभिलाषा पूर्ण करने वाले समस्त ऐश्वर्यों के आधार और कल्याण स्वरूप ,जो
सत्यमय है सत्य ही जिनका विग्रह है ,जो सत्य प्रदायक है ,ब्रह्मा और विष्णु जिनकी स्तुति करते हैं
,स्वेच्छानुसार शरीर धारण करने वाले उन भगवान शंकर की मैं वंदना करता हूँ !

(Visited 36 times, 1 visits today)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *