मानसिक पूजा और लौकिक पूजा

सामान्यतया पूजा के दो प्रकार हैं एक लौकिक पूजा जिसमें वैदिक अथवा पौराणिक मन्त्रों द्वारा अपने इष्ट की पूजा की जाती है और दूसरी जिसमें बाह्य जगत की कोई भी सामग्री या किसी अन्य वस्तु विशेष का प्रयोग नही हित है जिसे मानसिक पूजा कहते हैं।

लौकिक पूजा एक माध्यम है जिसके द्वारा हम अपने मन को केंद्रित कर सकते हैं,आज के युग में कर्मकांड का बहुत जोरों शोरों से खड़न किया जाता है जिसका कारण शायद कर्मकांड को न समझने की अज्ञानता और द्वेष हो सकता है,किन्तु कर्मकांडिक विधियां ऋषियों द्वारा प्रदत्त मानव कल्याण हेतु बहुत ही सुंदर सीढ़ियों का माध्यम है।भगवत प्राप्ति के लिए पहला आयाम जिसके माध्यम से सही मार्ग का चयन किया जा सकता है तो वह कर्मकांड ही हो सकता है,यद्यपि उपरोक्त कही गयी बातों को कुछ लोग न स्वीकार करें किन्तु यह सत्य है और इस सत्य को अपने तर्क और बुद्धि की कसौटी पर अवश्य आंकना चाहिए।एक अपवाद या यूं कहें कि आज के युग में कर्मकांड के नाम पर प्रत्यक्ष पाखण्ड और लूट पाट की जाती है इसमें कोई भी संदेह नही है,तथापि मेरा पाठकों के प्रति यही सुझाव रहेगा कि यदि हम आप कर्मकांडी की पहचान नही कर सकते तो किसी संतोषी विद्वान से परामर्श लेने में क्या कठिनाई है।

विधियां एक तरफ जहां लौकिक पूजा की विधियों के लिए शास्त्रों के सटीक एवं गूढ़ अध्ययन की आवश्यकता होती है वहीं दूसरी और अटूट श्रद्धा और भाव की भी उतनी ही आवश्यकता होती है।देव पूजन में तो यहां तक कहा गया है कि भाव से ही भगवान प्रशन्न होते हैं:-मूर्खो वदति विषणाय विज्ञ ओ वदति विष्णवे।द्वयोर्पि समं पुण्यं भाव ग्राही जनार्दनः।। अर्थात देव पूजा में भाव की प्रधानता अनिवार्य है।

शंका:- यहां शंका होती है कि जब भगवान भावग्राही ही हैं तो मन्त्रों की क्या आवश्यकता है बिना मन्त्रों के भी पूजा को किया जा सकता है?समाधान:- इसमें कोई संदेह नही है कि भगवान भाव से अधिक प्रशन्न होते हैं परंतु वेदमन्त्र तथा लौकिक मन्त्र अपने आप मे विशेष तरंगों को संग्रहित किये के रहते हैं जिनका शुद्ध उच्चारण होने पर वे यथावत शक्ति साधक को प्रदान करते हैं,दूसरी बात की मानव जीवन में अनेक प्रकार की समस्याएं तथा भागदौड़ रहती हैं जिनके रहते सामान्य व्यक्ति अपने मन को पूजा में केंद्रित नही कर पाता है,लेकिन मन्त्रों द्वारा किया गया पूजन उसके उस दोष का शमन कर देते हैं ओर व्यक्ति की पूजा सफल कर देते हैं।

मन्त्रों की शक्ति को समझने के लिए हम सामान्य दृष्टांत से समझते है कि मन्त्र उस विद्युत की नंगी तार की भांति होते हैं जिस तार को चाहे कोई अनजाने में पकड़े या जान बूझ कर परन्तु करंट दोनो ही अवस्थाओं में एक समान लगता है उसी प्रकार से मन्त्रों का प्रयोग(पूजा विशेष के लिए)साधक चाहे मन से करें या जैसे भी उसका फल उसे अवश्य मिलता है,किंतु पूजा अगर श्रद्धा और भाव से की जाए तो उसका आनंद साधक जन स्वयं जानते हैं जो कि अनिर्वचनीय है।इति।

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