शक्ति – सर्वस्वरूपिणी है

शक्ति – सर्वस्वरूपिणी है


वेदोपनिषत पुराणेतिहासादि ग्रन्थों में सर्वत्र देवी की अखण्ड कर अपार महिमा का विवरण वर्णन पाया
जाता है , जिससे स्पष्ट होता है कि शक्ति सृष्टि की मूल नाड़ी है , चेतना का प्रवाह है और सर्वव्यापी है
शक्ति की उपासना आज की उपासना नही है , वह अत्यंत प्राचीन हैं , बल्कि अनादि है ।

भगवत्पाद
श्रीशंकराचार्य जी ने ” सौन्दर्यलहरी ” में हमारा ध्यान इस और आकर्षित किया है और कहा है – ‘ शिव जब
शक्ति से युक्त होता है तब वह सृष्टि निर्माण समर्थ होता है , अन्यथा उसमें स्पंदनतक सम्भव नहीं है ।
अतएव हरि – हर ब्रह्मादि से आराध्या तुम्हारी नति या स्तुति पुण्यहीन व्यक्ति से कैसे सम्भव हो सकता है
? –

शिवः शक्तया युक्तो यदि भवति शक्त: प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।
अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरिञ्चादिभिरपि
प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति ।।

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