शक्ति – सर्वस्वरूपिणी है

महामाया शक्ति

शक्ति
का नाम ही माया है , महामाया है । शिव या परमेश्वर मायापति है पर अमायिक हैं । समस्त संसार उस
महामाया के प्रभाव से परिपूर्ण है , सबको भ्रांति में डालने वाली वही हैं । भगवत्पाद ने सौन्दर्यलहरी में कहा
है कि हे परब्रह्ममहिषी ।

अम्बा ! आगमविद तुम्हें ब्रह्मा की पत्नी सरस्वती कहते हैं , तुम्हें ही विष्णु की पत्नी
लक्ष्मी कहते हैं और तुम्हें ही हर की सहचरी पार्वती कहते हैं । तू इन सबसे परे या तुरिया , अनिर्वाच्या ,
अपार महिमावाली शुद्धविद्यान्तर्गत मायातत्त्व हो जो संसार को भ्रमित करती हो –

गिरामाहुर्देवीं द्रुहिणगृहिणीमागमविदो
हरेः पत्नीं पद्मां हरसहचरीमद्रितनयाम् ।
तुरीया कापि त्वं दुरधिगमनिस्सीममहिमा
महामाया विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषि ।।

सर्वत्र व्याप्त उस चिति की उपासना – वन्दना द्वारा हम अपने मानव जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास
कर सकते हैं जो प्रेय ओर श्रेय की प्राप्ति का सुलभोपाय है –


चितिरूपेण या कृत्स्त्रमेतद् व्याप्य स्थिता जगत् ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।

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