शक्ति – सर्वस्वरूपिणी है

मार्कण्डेय पुराण में


मार्कण्डेय पुरणान्तर्गत श्रीदुर्गाशप्तशती में भगवती की स्तुति करते हुए देवता कहते हैं –


विद्याः समस्तास्तव देवी भेदाः
स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु ।
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत्
का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः ।।


सभी विद्याएँ देवी के ही भेद हैं , संसार में जो भी स्त्रियाँ हैं , वे सब देवी के ही रूप हैं । समस्त संसार में व्याप्तएक ही तत्व है , वह है , देवीतत्त्व या शक्तितत्व । भगवती ! इससे बढ़कर स्तुति करने के लिए और रखा
भी क्या है ?

ऋगवेद में वर्णित


ऋग्वेद के देविसूक्त में देवी की सर्वव्यापकता का वर्णन है । रुद्र , वसु , आदित्य , विश्वदेव , मित्रावरुण ,
इंद्र , अग्नि , सोम , त्वष्टा , पूषा तथा भग आदि – इन सब में देवी की ही शक्ति है अर्थात् देवी की कला ही
इन रूपों में व्यक्त जानकर जो देवी की आराधना करते हैं या उनको हविष प्रदान करते हैं उनको देवी
धन्धानयसम्पन्न करती हैं –

{अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः ।
अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा ।।}
[अहं सोममाहनसं बिभर्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम् ।
<अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते ।।


देव्युपनिषत में भी इसी प्रकार का वर्णन है । सभी देवताओं ने देवी की सेवा में पहुंचकर पूछा , तुम कौन
हो महादेवी ? उत्तर में महादेवी ने कहा – मैं ब्रह्मस्वरूपिणी हूँ । मेरे ही कारण प्रकृतिपुरुषात्मक यह जगत् है ,
शून्य और अशून्य भी । मैं आनन्द और अनानंद हूँ । विज्ञान और अविज्ञान में मैं ही हूँ । मुझे ही ब्रह्म और
अब्रह्म समझना चाहिए । इस प्रकार अथर्वणश्रुति कह रही है ।

मैं पंचभूत हूँ और अपँचभूत भी । मैं अजा हूँ
, अनजा हूँ । मैं सारा संसार हूँ । मैं वेद और अवेद हूँ । मैं विद्या और अविद्या हूँ । मैं अध – ऊर्ध्व और तिर्यक
हूँ । रुद्रों में , आदित्यों में , विश्वदेवों में मैं ही संचरित रहती हूँ ।

मित्रावरुण , इंद्र , अग्नि ,अश्विन कुमार – इन
सबको धारण करने वाली मैं ही हूँ । मैं ही उरुविक्रम विष्णु को , ब्रह्मा को और प्रजापति को धारण करती
हूँ । मैं उपासक या याजक यजमान को धन देने वाली हूँ ।
यह महादेवी या महाशक्ति है , यही पराशक्ति है , आदिशक्ति है । यही आत्मशक्ति है और यही
विश्वमोहिनी है उस उपनिष्त में कहा गया है –
एषात्मशक्ति: एषा विश्वमोहिनी पाशाङ्कुशधनुर्वाणधरा । एषा श्रीमहाविद्या । य एवं वेद स शोकं तरति

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