शक्ति – सर्वस्वरूपिणी है

देवी की आराधना

तापत्रय मुक्ति के लिए , भवबन्ध विमोचन के लिए उसी शक्ति की आराधना करनी चाहिए , उसी की
शरण में जाना चाहिये । जो व्यक्ति इस तत्व को जानता है , वह अपने आत्मोध्दरका मार्ग प्रशस्त करता है
तथा शोक मोहादि उसके लिए कुछ नही होता ।
सभी देवताओं की कारणभूता सनातनी वही होने के कारण वह सर्वदेवमयी है । वहीं सत्व रज तम स्वरूपा
है । वह पापहारिणी एवं भुक्ति – मुक्ति प्रदायिनी है । अनन्तविजया , शुद्धा और शिवा वही शरण्या है ।
वह सर्वत्र एक ही रहती है , अतएव एका है । वह विश्वरूपिणी है , अतएव नैका है । इन शब्दों में हम उस
शक्ति की वंदना करते हैं –


मन्त्राणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञानरूपिणी ।
ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी ।
यस्याः परतरं नास्ति सैषा दुर्गा प्रकीर्तिता ।।

दुर्गा शब्द की व्युत्पत्ति

दुर्गात्संत्रायते यस्माद् देवी दुर्गेति कथ्यते
प्रपद्ये शरणं देवीं दुं दुर्गे दुरितं हर ।
तां दुर्गा दुर्गमां देवीं दुराचारविधातिनीम् ।
नमामि भवभीतोअहं संसारार्णवतारिणीम् ।।


यह तो स्पष्टोक्ति है दुःखदारिद्रीशमन करने वाली , भवभीति से युक्त व्यक्ति का उद्धार करने वाली , सर्व
मन्त्रों की मातृका , सर्व शब्दों की ज्ञानरूपिणी , चिन्मयी , परमानन्दस्वरूपा और समस्त दुराचारों की
विध्वंसिका उस शक्ति को पदे – पदे नमस्कार करना करना चाहिए ।

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