शक्ति – सर्वस्वरूपिणी है


विष्णुसहस्रनाम हो या शिवसहस्रनाम

– नामावलि में हम शक्तितत्व का स्मरण दिलाने वाले नामों को
अवश्य देखते हैं । यथा विष्णुसहस्रनाम में –


१- महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः ।
२ – सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्चयः ।
३ – श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः ।
४ – श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ।।
शिवसहस्रनाम में शक्ति का स्मरण किया गया है –
१ – दशबाहुस्त्वनिमिषो नीलकण्ठ उमापतिः ।
२ – उमापतिरुमाकान्तो जाह्नवीधृदुमाधवः ।

शक्तिपारम्य के विषय में पुराणों में अनेक कथाएँ हैं । देवीभागवत में देवी की असीम , अपरिमेय शक्ति
की कथा का वर्णन है ।

देवाभिमान खंडन

केनोपनिषद के द्वितीय खण्ड में ब्रह्म की जो कथा है , वह दैवीशक्ति के माहात्म्य
का उद्धाटन करती हैं । पराशक्ति की ही कृपा से इन्द्रादि देवता असुरों को हराकर जब विजयी हुए तब
अहं भाव के कारण वे समझने लगे कि उनकी विजय का कारण उनकी ही वीरता है अहं भाव प्रगति का
बाधक है । अहं भाव पतन का हेतु होता है ।

और उससे आत्मसाक्षात्कार किंवा ब्रह्मसाक्षात्कार नहीं होता
। इन्द्रादि को पतन से बचाने के लिए देवी शक्ति , जिसे ब्रह्म कहिये , तेजोरूप में उनके सामने प्रकट हुई ।
यह तेजोरूप यक्ष के रूप में था । यह यक्ष कौन है ? ब्रह्मा है , विष्णु है या शंकर हैं ? देवता जान न् सके ।
जिज्ञासा को शांत करने के लिए इंद्र ने पहले अग्नि को बुलाकर कहा कि यह जानो की यह यक्ष कौन हैं ?
अर्थात् ये तेजोरूप क्या है ?

अग्निदेव यक्ष के पास जाकर क्या बोलना चाहिए – यह समझ में न आने के
कारण चुप रहे तो यक्ष ने पूछा कि तुम कौन हो ? तब उन्होंने कहा कि मुझे , अग्नि तथा जातवेद ऐसा कहते
हैं । यक्ष ने पुनः प्रश्न किया कि तुममे क्या बल है ? उत्तर में अग्नि ने कहा कि मैं पृथ्वी में जो कुछ है सबको

अर्थात् जगत् को जला सकता हूँ । यक्ष ने उसके सामने एक तृण रखकर कहा कि इसको जला दो ।
अग्निदेव अपनी सर्वशक्ति लगाकर भी उस तृण को जला न् सके तो उनका गर्व भंग हो गया । लज्जित
होकर उन्होंने अपना रास्ता नाप लिया ।

(Visited 158 times, 4 visits today)

2 Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *