शक्ति – सर्वस्वरूपिणी है

वायु अभिमान

ततपश्चात इंद्र की आज्ञा से वायुदेव यक्ष के सामने पहुँचे तो यक्ष ने प्रश्न किया कि तुम कौन हो ? और
तुममें क्या शक्ति है ? वायु ने अपने पराक्रम का बखान करते हुए कहा की इस जगत् में जो कुछ है सबको
मैं उड़ा ले जा सकता हूँ । यक्ष ने पूर्ववत तृण उसके सामने रखकर उसके बल की परीक्षा करनी चाही ।
वायु सब प्रकार से यत्न किया ।

उनकी एक भी न् चली , लज्जा ही हाथ लगी । वे इंद्र के पास लौट आये
और कहा कि मैं नही जान सका कि यह यक्ष कौन है ?
स्वयं इंद्र ने यक्ष के स्वरुप को जानने की इच्छा से यक्ष के पास जाने का निश्चय किया। जब वे यक्ष के पास
पहुंचे तो यक्ष तिरोहित हो गया ।

इंद्र को चिन्ताकातरकी स्थिति में देखकर यक्ष का तेजोरूप हैमवती
उमारूप में आकाश में , जहाँ उसका अंतर्धान हुआ था , प्रकट हुआ और कहा कि वही पराशक्ति है , वही
परब्रह्म है ।
अग्नि , वायु , और इंद्र – इन तीनों में इंद्र सर्वश्रेष्ठ हैं , इस बात का द्योतन तो इस कथा से होता है और साथ ही
शक्ति की अपरिमेयता का भी ज्ञान होता है ।

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