शक्ति – सर्वस्वरूपिणी है

शक्तिपीठों की स्थापना


दक्षयज्ञविध्वन्स के उपरांत सती की देह के टुकड़े जहाँ जहाँ पड़े वहाँ वहाँ शक्तीपीठ स्थिर हुए हैं – ऐसा
बताया जाता है । कर्नाटक संगीत की प्रसिद्ध त्रिमूर्तियों में एक श्रीमुत्तुस्वामी दीक्षित जी ने अपने एक
पद में भगवती का वर्णन करते हुए कहा है कि वह पञ्चाशत्पीठरूपिणी हैं ।

कतिपय लोग इससे भी
अधिक संख्या में शक्तिपीठों की गणना करते हैं । पीठों के नामों के विषय में बहु कोई निश्चितता नही है
। यह बात है कि देवी की कला सर्वत्र व्याप्त है । यदि पौराणिक सत्य को स्वीकार करें तो यह कहना पड़ेगा
कि कई विशिष्ट स्थानों में शक्ति की विशिष्ट महिमा प्रतिष्ठित है ।

भगवत्पाद आदि शंकराचार्य जी ने धर्म की रक्षा और प्रबोध के लिए भारत की चारों दिशाओं में चार
आम्राय पीठों की स्थापना कर शक्तितत्त्व को पुनः जागृत किया है । इतना ही नही , अपनी दिग्विजय
यात्रा के समय उन्होंने देश के कई भागों में श्रीचक्रराज की स्थापना कर श्रीयंत्र की पूजा पद्धति की परंपरा
स्थिर की है ।

आम्राय पीठों की स्थापना भी उन्होंने इसे दिव्य क्षेत्रों में कि है । जहाँ दैवी शक्ति की
विशिष्टता विद्यमान है । श्रृंगेरी में उन्होंने आम्राय पीठ की जो स्थापना की , उसका एक कारण वहाँ के
प्राणियों में सहज ही निर्वेर्भाव ओर क्षेत्र की परम शांति है । जनश्रुति है कि प्रसवपीड़ा से तड़पने वाली

मेंढकी को सर्प नागराज छाया दे रहा था । जिन प्राणियों में स्वाभाविक जन्मजात वैर होता है , उसका
अभाव उस क्षेत्र में देखकर भगवत्पाद ने आम्राय पीठ की स्थापना करने का निश्चय किया । उन्होंने
श्रीचक्रोपरि शारदाम्बा की स्थापना की और कैलाश से प्राप्त श्रीचंद्रमोलीश्वर स्फाटिक लिंग की अर्चना
के साथ साथ श्रीचक्र की भी यथाविधि अर्चना का क्रम रखा । तबसे अब तक अविछिन्नरूप से यह परम्परा
चली आ रही है ।

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