शक्तीपीठों रहस्य

अन्य शक्तीपीठ

६ – दक्षिणकर्ण के पतनस्थल में कान्यकुब्जशक्तीपीठ हुआ , वहाँ ‘ ऊ ‘ कारकी उत्तप्ति हुई । गङ्गां यमुना के
मध्य , अन्तर्वेदी, नामक पवित्र स्थल में ब्रह्मादि देवों ने अपने अपने तीर्थों का निर्माण किया । वहां वैदिक
मंत्रों की सिद्धि होती है । कर्ण के मल के पतनस्थान में यमुनातट पर इंद्रप्रस्थ नामक उपपीठ हुआ ,
उसके प्रभाव से विस्मृत वेद ब्रह्मा को उपलब्ध हुए ।
७- नासिका के पतनस्थान में पूर्णागिरि शक्तीपीठ है , वह ‘ऋ’ कार का प्रादुर्भाव हुआ । वहाँ योगिसिद्धि होती
है और मंत्राधिष्ठातृदेव प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं


८ – वामगण्डस्थल की पतनभूमि पर अर्बुदाचल शक्तीपीठ हुआ , वहाँ ‘ ऋृ ‘ कार का प्रादुर्भाव हुआ । वहाँ
अम्बिका नामक शक्ति है तथा वाममार्ग की सिद्धि होती है ।

दक्षिणमार्ग में यहाँ विध्न होते हैं ।
९ – दक्षिणगण्डस्थल के पतनस्थान में आम्रातकेश्वरपीठ हुआ तथा ‘लृ ‘ कार की उत्तप्ति हुई । वह धन्दादि
यक्षिणियों का निवास स्थान है ।


१० – नखों से शक्तीपीठ

के निपतनस्थल में एकम्रपीठ हुआ तथा लृृृ कार की उत्तप्ति हुई । वह पीठ विद्याप्रदायक है ।


११ – त्रिवली के पतनस्थल में त्रिस्त्रोत शक्तीपीठ हुआ और वहाँ ‘ ए ‘ कार का जन्म हुआ । उसके पूर्व पश्चिम
तथा दक्षिण में वस्त्र के तीन खण्ड गिरे , वे तीन उपपीठ हुए । गृहस्थ द्विज को पौष्टिक मन्त्रों की सिद्धि
वहाँ होती है ।
१२ – नाभि के पतनस्थल में कामकोटीपीठ ओर वहाँ ‘ ऐ ‘ कार का प्रादुर्भाव हुआ । समस्त काममंत्रो की
सिद्धि वहाँ होती है । उसकी चारों दिशाओं में चार उपपीठ हैं , जहाँ अप्सराएं वास करती हैं ।
१३ -अंगुलियों को पतनस्थल हिमालयपर्वत पर कैलाशशक्तीपीठ तथा ‘ओं ‘ कार का प्राकट्य हुआ ।
अंगुलियाँ ही लिंगरूप में प्रतिष्ठित हुईं । वहाँ करमाला से मंत्रजप करने से तत्क्षण सिद्धि होती है ।

भृगु शक्तीपीठ

१४ – दंतों के पतनस्थल में भृगु शक्तीपीठऔर ‘ औ ‘ कारका प्रादुर्भाव हुआ ।

वैदिक आदि मन्त्र वहाँ सिद्ध होते
हैं ।

१५ – दक्षिण करतल के पतनस्थान में केदारशक्तीपीठ हुआ । वहाँ ‘अं ‘ की उत्पत्ति हुई । उसके दक्षिण में
कङ्कण. के पतन स्थान में अगतस्याश्रम नामक सिद्ध उपपीठ हुआ और उसके पश्चिम में मुद्रिका के

पतनस्थल में इन्द्राक्षी उपपीठ हुआ । उसके पश्चिम में वल्य के पतन स्थान में रेवतीतट पर राजेश्वरी
उपपीठ हुआ ।
१६ – वामगण्ड की निपातभूमि पर चंद्रपुर पीठ हुआ तथा ‘अः ‘ की उत्पत्ति हुई । सभी मन्त्र वहाँ सिद्ध होते
हैं ।

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