शक्तीपीठों रहस्य

वर्णमालाएँ

अ , आ, इ , उ , ऊ , ऋ , ऋृ , लृ ,लृ , ए ,ऐ , ओ , औ , अं , अः । क,.ख ,.ग ,घ, ङ,। च , छ , ज , झ , ञ , । ट , ठ ,
ड , ढ , ण । त , थ , द , ध , न , । प ,फ , ब , भ , म., । य , र , ल ,व , श , ष , स.,ह , . , क्ष , यही ५१ अक्षर की
वर्णमाला है ।

यहाँ अंतिम अक्षर ‘ क्ष ‘ अक्षरमाला का सुमेरु है । इसी माला के आधार पर सती के भिन्न
भिन्न अंगों का पात हुआ है । इससे यह निष्कर्ष निकला कि इतनी भूमि वर्ण समाम्रायस्वरूप ही है । भिन्न
भिन्न वर्णों की शक्तियाँ ओर देवता भिन्न भिन्न हैं । इसलिए उन उन वर्णों , पीठों शक्तियों एव देवताओं का
परस्पर सम्बन्ध है , जिसके ज्ञान और अनुष्ठान से साधक को शीघ्र ही सिद्धि होती है ।
मायद्वारा ही परब्रह्म से विश्व की सृष्टि होती है । सृष्टि हो जाने पर भी उसके विस्तार की आशा तब तक नही
होती , जब तक चेतन पुरुष की उसमें आसक्ति न हो । अतएव सृष्टिविस्तार के लिए काम की उत्तप्ति हुई

राजसिक


। रजः सत्व के सम्बंध से दैवतसृष्टि का विस्तार होता है । किंतु तमस कारणरूप है , वहाँ द्वैतदर्शन की कमी
से मोह की कमी होती है । सत्त्वमय सूक्ष्मकार्य रूप विष्णु एवं रजोमय स्थूलकार्य रूप ब्रह्मा के मोहित हो
जाने पर भी कारणातमा शिव मोहित नहीं होते , किन्तु जबतक कारण में मोह नही , तबतक सृष्टि की पूर्ण
स्थिति भी सम्भव नही होती । इसलिए स्थूल सूक्ष्मं कारीचेतन्ययों की ऐसी रुचि हुई कि कारण चैतन्य भी
मोहित हो , किन्तु वह अघटित , घटना , पटियसी महामाया के वश की बात है ।

इसलिए सबने उसी की
आराधना की ।

रहस्य

देवी प्रसन्न हुई , वे अपने पति को स्वाधीन करना चाहती थी । स्वाधिनभर्तृका ही स्त्री परम्
सौभाग्यशालिनी होता है । वही हुआ ।

महामाया ने शिव को स्वाधिन कर लिया फिर भी पिता द्वारा पति
का अपमान होने पर उन्होंने उस पिता से सम्बन्ध शरीर को त्याग देना ही उचित समझा । महाशक्ति का
शरीर उनका लीलाविग्रह ही है । निर्विकार चैतन्य शक्ति के योग से साकार विग्रह धारण करता है , वैसे ही
शक्ति भी अधिष्ठान – चैतन्य युक्त साकार विग्रह धारण करती हैं । इसलिए शिव पार्वती दोनों मिलकर
अर्धनारीश्वर के रूप में व्यक्त होते हैं । अधिष्ठान चैतन्य सहित महाशक्ति का उस लीलाविग्रह सती शरीर
से तिरोहित हो जाना ही सती का मरना है ।

अन्य जानकारी के लिए यहां क्लिक करें शक्तिपीठों का प्रादुर्भाव

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