शक्तीपीठों रहस्य

आराधना में

प्राणी की तपस्या एवं आराधना से शक्ति को जन्म देने का एवं उसे परमेश्वर से सम्बंधित कर अपने को
कृतकृत्य करने का सौभाग्य प्राप्त होता है । किंतु यदि बीच में प्रमाद से अहंकार उतपन्न हो जाता है तो
शक्ति उससे सम्बन्ध तोड़ लेती है और फिर उसकी वही स्थिति होती है , जो दक्ष की हुई । सती का शरीर
यद्यपि मृत हो गया , तथापि वह महाशक्ति का निवासस्थान था ।

श्रीशंकर उसी के द्वारा उस महाशक्ति में
रत थे , अतः मोहित होने के कारण भी फिर उसको छोड़ न् सके । यद्यपि परमेश्वर सदा स्वरूप में ही
प्रतिष्ठित होते हैं , फिर भी प्राणियों के अदृष्टवश उनके कल्याण के लिए सृष्टि , पालन , संहरण , आदि
कार्यों में प्रवृत्त से प्रतीत होते हैं । उन्हीं के अनुरूप महामाया में उनकी आसक्ति और मोह की भी प्रतीति
होती है । इसी मोहवश शंकर महाशक्ति के अधिष्ठानभूत उस प्रिय देह को लेकर घूमने लगे ।

शिव मोह

देवताओं और विष्णु ने मोह मिटाने के लिए उस देह को शिव से वियुक्त करना चाहा । साथ ही अनन्त
शक्तियों की केन्द्रभूता महाशक्ति के अधिष्ठान भूत देह के अवयवों से लोक का कल्याण हो , यह भी
सोचकर भिन्न भिन्न शक्तियों के अधिष्ठानभूत भिन्न भिन्न अंग जिन जिन स्थानों में पड़े , वहाँ उन उन
शक्तियों की सिद्धि सरलता से होती है ।

जैसे कपोत ओर सिंह के मांस आदि को में भी उसकी भिन्न
विशेषता प्रकट होती है , वैसे ही सती के भिन्न भिन्न अवयवों में भी उनकी विशेषता प्रकट होती है ।
इसलिए जैसे हिंगु के निकल जाने पर भी उसके अधिष्ठान में उसकी गन्ध या वासना रहती है , वैसे ही
सती की महाशक्तियों के अन्तर्हित होने पर भी उन अधिष्ठानों में वह प्रभाव रह गया है ।

यथा

जैसे
सूर्यकांतमणि पर सूर्यों की रश्मियों का सुंदर प्राकट्य होता है , वैसे ही ङ् शक्तियों के अधिष्ठानभूत अंगों
में उनका प्राकट्य बहुत सुंदर होता है । यहाँ तक कि जहाँ जहाँ उन अंगों का पात हुआ , वे स्थान भी दिव्य
शक्तियों के अधिष्ठान माने जाते हैं । वहाँ भी शक्तितत्त्व का प्राकट्य अधिक है ।

अतएव उन पीठों पर
शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त होती है , अंग्सम्बन्धी कोई भी अंश या भूषण वसनादिका जहाँ पात हुआ , वही
उपपीठ है । उनमें भी उन उन विशेष शक्तितत्वों का आविर्भाव होता है । अनन्त शक्तियों की केन्द्रभूता
महाशक्ति का जो अधिष्ठान हो चुका है , उसमें एवं तत्वसम्बन्धी समस्त वस्तुओं में शक्तितत्व बाहुल होना
ही चाहिए । वैसे तो जहाँ भी , जिस किसी भी वस्तु में जो भी शक्ति है , उन सभी का अंतर्भाव महामाया में
ही हैं –

यच्च किन्चित् क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके ।
तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयते तदा ।।

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