सभी शुभ कार्यों में कलश क्यो लगाते है?

सभी शुभ कार्यों में कलश क्यो लगाते है?

एक समय जब देवासुर संग्राम हुआ, तब समुद्र में से चौदह रत्नों की उत्पत्ति हुई,

उन चौदह रत्नों में अंतिम रत्न था कलश, अर्थात अमृत कलश उस अमृत कलश के कारण पुनः देवताओं और असुरों में संग्राम प्रारम्भ हो गया

, जिसे शांत करने के लिए भगवान श्री हरि को मोहिनी रूप लेना पड़ा। तभी से कलश की महत्ता ओर उपयोगिता  प्रारम्भ हो गयी थी,

आईये जानते हैं क्यों है कलश पूजनीय?

          सबसे पहले कलश के विषय मे जान लें कि उसमें किन किन देवताओं का निवास होता है।

कलशस्य मुखे विष्णु: कण्ठे रुद्रसमाश्रिता।

मूलेत्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः।।

कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्तद्वीप वसुंधरा।

ऋग्वेदोथ यजुर्वेदः सामवेदोह्यथर्वण:।।

अंगैश्च सहिता सर्वे कलशन्तु समाश्रिताः

अत्र गायत्री सावित्री शांति पुष्टिकरी ततः।।

  मंत्रों का अर्थ

 अर्थात कलश के मुख में भगवान विष्णु का वास होता है,कण्ठ में रुद्र,मूल में ब्रहम्मा जी,मध्य में सात जल मातृकाएं,

सात स्थल मातृकाएं,कुक्षी में सप्त सागरों का तथा सप्त द्वीपों सहित पृथ्वी का वास होता है,

इन सभी के अतिरिक्त चारों वेदों का वास भी कलश में होता है,वेद माता गायत्री और सावित्री भी कलश में निवास करती हैं

,इस लिए कलश की इतनी महत्ता है कि किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने से पूर्व कलश का पूजन किया जाता है,

और उस समय न केवल एक लोटा या घड़ा रूपी कलश का पूजन नही किया जाता है ,

अपितु समस्त ब्रह्मांड सहित इस सृष्टि के सृजन,पालन,ओर संहार कर्ता का पूजन किया जाता है

इसलिए कलश पूजन करते समय हमारा मन भी इन सभी देवताओं के पूजन में होना चाहिए।

   आध्यात्मिक दृष्टिकोण

   अब जैसा कि ऊपर कहा गया कि सृजन,पालन और संहारक ब्रह्मा,विष्णु,शिव का पूजन कलश में मुख्य रूप से किया जाता है

, तो हम विचार करते है यह सृष्टि एक कलश है, और उस कलश में हम चराचर प्राणी निवास करते हैं

, और सम्पूर्ण सृष्टि का आदि भी जल है, जल से ही सभी प्रणियों की उतपत्ति होती है,फिर ये जल किसी भी रूप में हो सकता है

वीर्य-रज के रूप में हो जिससे द्विपद,चतुष्पद की उतपत्ति होती है,या स्वेद(पसीना)के रूप हो जहाँ से खटमल,कृमियों की उतपत्ति होती है.

या फिर किसी भी तरह से….तो कलश का पूजन अर्थात सम्पूर्ण सृष्टि के पालन का पूजन,

    यौगिक अर्थ

      अब विचार करते हैं विष्णु अर्थात पालन करता कि, तो जल के बिना क्या जीवन संभव है? हो ही नही सकता, और अगर कहें कि योग से अन्न जल के बिना जीवन संभव है

,तो उसमें भी खेचरी मुद्रा सिद्ध करके जिह्वा को तालु का स्पर्श करवा कर मोड़ करके जो अमृत रूपी रस कण्ठ में टपकता है,

वह भी जल ही एक रूप है,तो वही कलश इस सृष्टि का पालन करता भी है उसी जल से कृषि होती है,

जिससे अन्न उपजता है और सभी प्राणी जीवित रहते हैं

,इसलिए कलश का पूजन इस सृष्टि के पालन करता का पूजन है,

        अब अगर विचार करते है संहारक की तो जल का रौद्र रूप ही कितना भयानक होता है,

इससे तो सभी परिचित है नदियां जब अपने रौद्र रूप में बाढ़ लेकर आती हैं,

तो कितने जन धन का नाश कर देती है, समुन्द्र जब अपनी मर्यादा तोड़ देता है,

तो सब विलय हो जाता है,एक छोटी सी ज़हर की सीसी ओर उसकी मात्र एक बूँद एक हृष्ट पुष्ट व्यक्ति को मृत्यु के घाट उतार देती है

,अर्थात यही जल न जाने किस किस रूप से हमें अपना संहारक रूप भी प्रदर्शित करवाता है

,तो यह कलश सृष्टि का नाश करने में समर्थ उस संहारक शक्ति का भी हमें बोध करवाता है,

इसलिए कलश का पूजन उन भगवान महाकाल का पूजन है जो सभी कालों का भी काल है।

कलश किस धातु का होता है?

       कलश का वर्णन शास्त्रों में विभन्न प्रकार से होता आया है, कहीं पर कलश स्वर्ण का तो कहीं तांबे का तो

कहीं मिट्टी का कलश का वर्णन प्राप्त होता है,

1- राज्य की प्राप्ति के लिए स्वर्ण कलश का पूजन श्रेयस्कर होता है,

अर्थात राजाओं को या आज के युग के अनुसार नेताओं को अभिनेताओं को स्वर्ण के कलश की पूजा श्रेयस्कर है।

2-धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की सिद्धि एवं आकर्षण शक्ति के लिए तथा शत्रुओं के नाश के लिए

ताम्र का कलश श्रेयस्कर होता है,गृहस्थी जनों को ताम्र कलश श्रेयस्कर होता है।

3-निष्काम भाव से जो भगवान का पूजन करते है, सभी जीवों का जो कल्याण चाहते हैं

ऐसे जनों को मिट्टी के कलश का पूजन करना चाहिए,मिट्टी का कलश सभी कलशों में श्रेष्ठ है ।

कलश का पूजन कब और कैसे करें?

       कलश का पूजन सभी प्रकार के शुभ कर्मों,गृह प्रवेश,जन्मदिन,पुराण श्रवण,व्रत उद्यापन,विवाह,संस्कारों इत्यादि में करना

चाहिए, कलश पूजन से पूर्व गणपति पूजन करना चाहिए उसके पश्चात रेत या बालू का ढेर लगा कर उसे

अष्टदल इत्यादि से विभूषित करना चाहिए और रेत में जौ बीज देने चाहिये फिर!

स्योना पृथिवी०इत्यादि मन्त्रों से कलश में जल,गंध,अक्षत,पुष्प,कुश पवित्री,दूर्वा,पूगीफल,पंचरत्न,

सर्वोषधि इत्यादि पूजा की सामग्री डालनी चाहिए  उसके ऊपर पूर्ण पात्र स्थापित करना चाहिए

पूर्ण पात्र पर नारियल लाल वस्त्र से लपेट कर रखना चाहिए।

     नारियल को कदापि खड़ा नही लगाना चाहिए, यजमान के मुख की तरफ ही नारियल का मुख होना चाहिए,

उसके बाद वैदिक एवं लौकिक मन्त्रों से कलश का पूजन करना चाहिए।

          इस प्रकार से पूजन करके जब पूजा या यज्ञ की समाप्ति हो जाये ,तब उस जल से सभी को छींटे लेने चाहिए

और सारे घर इत्यादि में भी छींटे देने चाहिए।

           ।।इति।।

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One comment

  • बहुत सुंदर जानकारी जानकारी लेकर अच्छा लगा।।।। और आपसे एक मैं अनुरोध करता हूं । महोदय जी आरटी जेसीओ में जो इस बार अनुमान के हिसाब से पेपर आएगा पहला हो या दूसरा उसका प्रश्न एवं उत्तर के साथ टिक लगा कर 70…..70 प्रश्नों का पीडीएफ डाल दीजिए ना । आपकी बड़ी कृपा होगी समय भी आप कम बचा है अध्ययन तो कर रहे हैं तब भी आपकी अपनी तरफ से अपने आप प्रश्न बनाकर डाल दीजिए सबका भला हो। जयतु भारतम्।।

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