सरस्वती ध्यान

सरस्वती माता

विद्या की देवी भगवती सरस्वती हैं,जो साधक अपुपम कवित्व की शक्ति तथा विद्या के क्षेत्र में उन्नति चाहते हैं,

उनके लिए माँ सरस्वती की साधना करनी चाहिए! माता सरस्वती की कृपा से गूंगा भी बोलने लग जाता है,और बड़ी बड़ी सुंदर कविताओं की रचना करने लग जाता है! माता सरवती को प्र्शन्न करने के लिए प्रतिदिन उनकी स्तुति करनी चाहिए,और उनका पूजन करके उनसे प्रर्थना करनी चाहिए!

आइये जानते है माँ सरस्वती के ध्यान और प्रार्थना के श्लोकों को जिनसे भगवती शीघ्र प्रशन्न होती है !

सरस्वती ध्यान मंत्र

ऊँ सरस्वती मया दृष्ट्वा,वीणा पुस्तक धारणीम् ।

हंसवाहिनी समायुक्ता मां विद्या दानं करोतु में ।।

ऊँ सरस्वती नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि ।

विद्यारम्भं करिष्यामि सिध्दिर्भवतु मे सदा ।।

शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमांद्यां जगद्व्यापनीं ।

वीणा पुस्तक-धारिणीमभयदां जाङ्यांधकारपहाम् ।।

हस्ते स्फाटिक मालिकां विद्धतीं पद्मासने संस्थिताम् ।

वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुध्दिप्रदां शारदाम् ।।

शारदा शारदाभौम्वदना । वदनाम्बुजे । सर्वदा

सर्वदास्माकमं सन्निधिमं सन्निधिमं क्रियाम् ।।

ऊँ श्री सरस्वती शुक्लवर्णां सस्मितां सुमनोहारम् ।

कोटिचन्द्रप्रभामुष्टपुष्टश्रीयुक्तविग्रहम् ।।

वह्निशुध्दां शुकाधानां वीणापुस्तकमधारिणीम् ।

रत्नसारेन्द्रनिर्माणनवभूषणभूषिताम्

सचपूजितां सुरगणैब्रह्मविष्णुशिवादिभिः ।

वन्दे भक्तया वन्दिता च मुनीन्द्रमनुमानवैः ।।

माँ सरस्वती ध्यान मंत्र

ऊँ उद्यभ्दानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां

रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम् ।

हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं

देवीं बध्दहिमांशुरत्नमुकुटां वन्देअरविन्दस्थिताम्।।

जगदम्बा के श्री अंगों की कान्ति उदय काल के सहस्रों सूर्यों के समान है वे लाल रंग की रेशमी साडी़ पहने

हुए हैं उनके गले में मुण्डमाला शोभा पा रही है दोंनों स्तनों पर रक्त चन्दन का लेप लगा है वे अपने कर

कमलों में जपमालिका,विद्या और अभय तथा वर नामक मुद्राएँ धारण किये हुए हैं तीन नेत्रों से सुशोभित

मुखारविन्द की बडी़ शोभा हो रही है उनके मस्तक पर चन्द्रमा के साथ ही रत्नमय मुकुट बँधा है तथा वे

कमल के आसन पर विराजमान हैं ऐसी देवी को मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ

माता का ध्यान

ऊँ अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं धृतपाशाङ्कुशबाणचापहस्ताम् ।

अणिमादिभिरावृतां मयूखैरहमित्येव विभावये भवानीम् ।।

मैं अणिमा आदि सिध्दिमयी किरणों से आवृत भवानी का ध्यान करता हूँ । उनके शरीर का रंग लाल है , नेत्रों में करुणा लहरा रही है तथा हाथों में पाश अंकुश , बाण और धनुष शोभा पाते हैं

ऊँ ध्यायेयं रत्नपीठे शुककलपठितं शृण्वतीं श्यायलङ्गीं

न्यस्तैकाङ्घ्रिं सरोजे शशिशकलधरां वल्लकीं वादयन्तीम् ।

कह्लाराबध्दमालां नियमितविलसच्चोलिकां रक्तवस्त्रां

मातङ्गीं शखंपात्रा मधुरमधुमदां चित्रकोद्भासिभालाम् ।।

मैं मातङ्गी देवी का ध्यान करता हूँ वे रत्नमय सिंहासन पर वैठ कर पढते हुए तोते का मधुर शब्द सुन रही हैं

। उनके शरीर का वर्ण श्याम है । वे अपना एक पैर कमल पर रखे हुए है।और मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण

करती हैं । कह्लर पुष्पों की माला धारण किये वीणा बजाती हैं ।उनके अंग में कसी हुई चोली शोभा पा

रही है । वे लाल रंग की साडी़ पहने हाथ में शंखमय पात्र लिए हुए है और उनके वदन पर मधु का हल्का

हल्का प्रभाव जान पड़ता है । और ललाट में बिन्दी शोभा. दे रही है ।

ऊँ नागाधीश्वरविष्टरां फणिफणोत्तंसोरुरत्नावलीभास्वद्देहलतां

दिवाकरनिभां नेत्रत्रयोभ्दासिताम् ।

मालाकुम्भकपालनीरजकरां चन्दद्रार्धचूडां परां

सर्वज्ञेश्वरभैरवाङ्कनिलयां पद्मावतीं चिन्तये ।।

मैं सर्वज्ञेश्वर भैरव के अंक में निवास करने वाली परमोत्कृष्ट पद्मावती देवी का चिन्तन करता हूँ । वे

नागराज के आसन पर वैठी हैं । नागों के फणों में सुशोभित होने वाली मणियों की विशाल माला से

उनकी देहलता उद्भासित हो रही हैं । सूर्य के समान उनका तेज है, तीन नेत्र उनकी शोभा बढा़ रहे हैं ।वे

हाथों में माला, कुम्भ, कपाल, और कमल लिये हुए हैं तथा उनके मस्तक में अर्धचन्द्र का मुकुट सुशोभित है!

सरस्वती ध्यान

ऊँ घण्टाशूलहलानि शख्ङमुसले चक्रं धनुः सायकं

हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम् ।

गौरीदेहसमुभ्दवां त्रिजगतामाधारभूतां महापूर्वामत्र

सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम् ।।

जो अपने कर कमलों में घण्टा, शूल ,हल ,शंख ,मूसल ,चक्र, धनुष,और बाण धारण करती हैं , शरद्ऋतु के

शोभा सम्पन्न चन्द्रमा के समान जिनकी मनोहर कान्ति है जो तीनों लोकों की आधारभूता और शुम्भ

आदि दैत्यों का नाश करने वाली हैं तथा गौरी के शरीर से जिनका प्राकट्य हुआ है ,उन महासरस्वती देवी

का मैं निरन्तर भजन करता हूँ ।

सरस्वती ध्यान

या कुन्देदुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्रावृता

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।

याब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ।।

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