सिद्ध पीठों का वर्णन

मध्यप्रदेश के शक्तिपीठ


सिद्ध पीठ देश के अन्य प्रांतों की भांति मध्यप्रदेश भी देवी उपासना की अत्यंत प्राचीन परंपरा है । यहाँ के
बुन्देलखण्ड ,बधेलखण्ड , नेमाड़ तथा मालवा अंजलों में लोकदेवी के रूप में देवीपुजन की प्रथा है । यहाँ
स्थान स्थान पर लोकदेवीयों के मंदिर तथा थान हैं । इस प्रदेश में ४ शक्तिपीठ है । इनका संक्षिप्त विवरण
इस प्रकार है ।


भैरवपर्वत


इस सिद्ध पीठ के संदर्भ में विद्वानों के दो मत है । कुछ विद्वान् गुजरात में गिरनार के निकट स्थित
भैरवपर्वत को शक्तिपीठ मानते है तो कुछ विद्वान् मध्यप्रदेश में उज्जैन के निकट शिप्रानदी के तट पर
स्थित भैरवपर्वत को शक्तिपीठ मानते हैं । दोनों ही स्थलों को देवी के पूजा स्थल मानकर श्रद्धापूर्वक
दर्शन करना चाहिए । यहाँ देवीदेह का ऊर्ध्व ओष्ठ गिरा था । यहाँ की शक्ति अवन्ति और भैरव ‘ लम्बकर्ण ‘
है ।

रामगिरि

इस सिद्ध पीठ/शक्तिपीठ के सम्बंध में दो मान्यताएं है कुछ विद्वान् चित्रकूट के शारदामन्दिर को और कुछ विद्वान्
मैहर के शारदामन्दिर को यह शक्तिपीठ बताते है । दोनों ही स्थान प्रसिद्ध तीर्थ है और मध्यप्रदेश में
स्थित है । यहाँ देवीदेह का दाहिना स्तन गिरा था । यहाँ की शक्ति शिवानी और भैरव चण्ड , है ।

उज्जयिनी


सिद्ध पीठ उज्जैन में रुद्रसरोवर या रुद्रसागर के निकट हरसिद्धिदेवी का मंदिर है । इसे ही शक्तिपीठ माना जाता है
। यहाँ देवीदेह की कुहनी गिरी थी । अतः उसी की पूजा होती है । यहाँ की शक्ति ‘मंगलचण्डीका और भैरव
माँगल्यकपिलाम्बर है । यह मंदिर चारदीवारों से घिरा हुआ है ।

यंत्र

मन्दिर में मुख्य पीठ पर प्रतिमा के स्थान
पर श्रीयन्त्र विराजमान है और उसके पीछे भगवती अन्नपूर्णा की प्रतिमा है । वर्तमान में मन्दिर के गर्भगृह में
स्थित हरसिद्धिदेवी की प्रतिमा को भी पूजा होती है । मन्दिर में महाकालीका , महालक्ष्मी , महासरस्वती
,और महामाया की भी प्रतिमाएं है । मन्दिर के पूर्वद्वार पर बाबड़ी है जिसके बीच में एक स्तम्भ है तथा
निकट ही सप्तसागर सरोवर है ।

मन्दिर के जगमोहन के सामने दो बड़े बड़े दीपस्तम्भ बने हुए हैं । प्रतिवर्ष
आश्विन मास के नवरात्र में पांच दिन तक इन पर दीप मालाएं लगाई जाती हैं उस समय यहाँ की शोभा
अपूर्व दिखाई पड़ती है । इन दिनों यहाँ हजारों दर्शनार्थी आते हैं ।

कथा


स्कन्दपुराण के अवन्तिकाखण्ड में उज्जयनिमाहात्म्य विस्तार से प्राप्त है । उज्जयनिमाहात्म्य विस्तार से
प्राप्त होता है । उज्जयनिमाहात्म्य में श्रीहरसिधिदेवी वर्णन इस प्रकार आया है
प्राचीन काल में चण्ड प्रचण्ड नामक दो राक्षस थे , जिनके अत्यचारों से संसार त्राहि त्राहि कर उठा था ।
एक बार ये दोनों कैलाश पर गए और वहाँ नन्दी के रोकने पर उन्हें घायल कर दिया ।

भगवान शंकर ने
इनकी उग्रता और दुराचरण को देखकर भगवतीं का स्मरण किया और उनसे चण्ड, प्रचण्ड का वध कर
जगत् को त्राण देने का अनुरोध किया । भगवती देवी चंडी ने अभी मरती हूँ – मात्र इस संकल्प से ही
उसका वध कर दिया । तब भगवान हरने कहा चण्डी ! तुमने दोनों दुष्ट दानवों का संहार किया है । इसलिए
लोक में तुम ‘ हरसिद्धि ‘ के नाम से विख्यात होओगी ।

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