सिद्ध पीठों का वर्णन

वृन्दावन


सिद्ध पीठ मथुरा वृन्दावन के बीच भूतेश्वर नामक रेलवे स्टेशन के समीप भूतेश्वर मन्दिर के प्रांगण में यह शक्तिपीठ
अवस्थित है । यह स्थान चामुण्डा कहलाता है । तन्त्रचुडामणि में इसे मौली शक्तिपीठ माना गया है । यह
स्थान महर्षि शाण्डिल्य की साधना स्थली भी रही है । यहाँ देवी देह के केशपाश का पतन हुआ था । यहाँ
की शक्ति उमा और भैरव भूतेश है ।


वाराणसी


सिद्ध पीठ मीरघाट पर धर्मेश्वर के समीप विशालाक्षी गौरी का प्रसिद्ध मंदिर है । यहाँ भगवान विश्वनाथ विश्राम
करते थे और सांसारिक कष्टों से पीड़ित मनुष्यों को विश्रांति देते थे ।
विशालाक्ष्या महासौधे मम विश्रामभूमिका ।
तत्र संसृतिखिन्नानां विश्रामं श्राणयाम्यहम् ।।

यहाँ देवी की दाहिनी कर्ण मणि गिरी थी । यहाँ की शक्ति विशालाक्षी और भैरव कालभैरव है ।


प्रयाग


सिद्ध पीठ अक्षयवट के निकट ललितादेवी का मंदिर है , कुछ विद्वान् इसे ही शक्तिपीठ मानते हैं । कुछ विद्वान्
अलोपी माता के मंदिर को शक्तिपीठ मानते हैं । वहाँ भी ललितादेवी का मंदिर है , साथ ही अन्य मान्यता
के अनुसार मीरपुर में ललितादेवी का शक्तिपीठ है । यहाँ देवी देह की हस्तांगुली गिरी थी । यहाँ की
शक्ति ,ललिता , ओर भैरव ‘ भव ‘ है ।वीरधर्मा वसुंधरा राजस्थान की आराध्या पराम्बा शक्ति ही है , पूरे प्रदेश में उनके मन्दिर तथा स्थान है ।
इस भू, भाग में देवी के २ शक्तिपीठ है । इनका विवरण इस प्रकार है

मणिवेदिक


सिद्ध पीठ राजस्थान के पुष्कर सरोवर के एक ओर पर्वत की चोटी पर सावित्री देवी का मंदिर है , उसमें सावित्री देवी
की तेजोमयी प्रतिमा है । दूसरी ओर दूसरी पहाड़ी की चोटी पर गायत्रीमन्दिर है । यह गायत्रीमन्दिर ही
शक्तिपीठ है । यहाँ देवीदेह के मणिबन्ध गिरी थीं । यहाँ की शक्ति ‘ गायत्री ‘ और भैरव ‘ शर्वानन्द है ।


विराट


जयपुर से ६४ किलोमीटर उत्तर में महाभारतकालीन विराट नगर के पुराने खण्डहर है , इनके पास में ही
एक गुफा है , जिन्हें भीम का निवास स्थान कहा जाता है अन्य पांडवों की भी गुफाएं हैं । पांडवों ने वनवास
का अंतिम वर्ष अज्ञातवास के रूप में यहीं बिताया था । जयपुर तथा अलवर दोनों स्थानों से यहाँ आने के
लिए मार्ग है । यहीं पर वैराट ग्राम में शक्तिपीठ है । यहाँ देविदेह के दाएँ पैर की अंगुलियाँ गिरी थी । यहाँ
की शक्ति ‘ अम्बिका ‘ और भैरव ‘ अमृत ‘ है ।

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