भगवान शिव का ध्यान

ध्यानं वन्देअ्हं सकलं कलंक-रोहितं स्थाणोर्मुखं पश्चिमम् । शुभं त्रिलोचनं नाम्ना सद्योजातं शिव पदम् ।। वामदेवं सुवर्णाभं दिव्यास्त्रगण सेवितम् । अजन्मानमुमाकान्तं वन्देअ्हं हि उत्तरं मुखम् ।। बालकं वर्णमारक्तं पुरुषं च तडित्प्रभम् । दिव्यं पिङ्गजटाधारं वन्देअ्हं पूर्वादिक मुखम् ।। मधयाण्हार्क समप्रभं शशिधरं भीमाट्टहासोज्जवलं, त्र्यक्षं पन्नगभूषणं शिखि शिखाश्मश्रु स्फुरन्मूर्धजम् । हस्ताब्जैः त्रिशिखं समुदगरमसिं शक्तिं दधानं विभुं दंष्ट्राभीम चतुर्मुखं पशुपतिं दिव्यास्त्र रूपं शंकरं स्मरेत ।। अर्थात् – जिनकी प्रभा मध्याण्ह सूर्य के समान दिव्य रूप में मासित हो रही है जिनके मस्तक पर चन्द्रमा

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शिव ध्यान

देवो के देव महादेव जितने भोले है उतनी ही उनकी लीलाओ का वर्णन है,भगवान आशुतोष के नाम से जाने, वाले महादेव अपने भक्तों की गलतियों पर भी संतुष्ट हो जाते हैं! महादेव की शरण भला कौन नहीं जाना चाहता ,इस घोर कलिकाल में भगवान महादेव ही सबकी नय्या वाले है !उन महदेव भगवान को प्रशन्न करना बहुत ही आसान है !जो भक्त श्रद्धा पूजा अर्चना करता है ,वह मनोकामनाओं की पूर्ति भी शीघ्र ही प्राप्त क्र लेता है! तो आईये

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