भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

हरियाणवी लोक गीतों में गाँधी | लोकगीत

हरियाणवी लोक गीतों में गाँधी | लोकगीत

देस के हो रे थे बारां बाट।
बणिया, बाह्मण अर कोई जाट॥

अर था कोई अछूत कहलाया।
बाब्बू का दिल था भर आया॥

बाब्बू नै मिटाई छूआछात।
सब सैं भारत माँ के पूत॥

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी आप करें!

टिप्पणी लिखें (Write a Comment)

CAPTCHA

मेरी पसंदीदा रचनाएँ

आपने अभी तक कोई रचना सहेज कर नहीं रखी है।