जब साजन ही परदेस गये मस्ताना फागण क्यूँ आया
जब सारा फागण बीत गया तैं घर में साजन क्यूँ आया
छम छम नाचैं सब नर नारी मैं बैठी दुखा की मारी
मेरे मन में जब अंधेरा मचा तैं चान्द का चांदण क्यूँ आया
इब पीया आया जी खित्याना जब जी आया पी मित्याना
साजन बिन जोबन क्यूँ आया जोबन बिन साजन क्यूँ आया
मन की तै अर्थी बंधी पड़ी आख्या मैं लागी हाय झड़ी
जब फूल मेरे मन का सूक्या लजमार फागण क्यूँ आया
[साभार - हरियाणा के लोकगीत]
भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।
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