भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

मिली अंधेरे नै सै छूट | हरियाणवी ग़ज़ल

मिली अंधेरे नै सै छूट | हरियाणवी ग़ज़ल | Haryanvi Ghazal by Risal Jangra

मिली अंधेरे नै सै छूट
रह्या उजाले नै यू लूट

उसका पक्कम सत्यानाश
पड़ग्यी सै जिस घर मैं फूट

मंदिर म्हं खडकावै टाल
बोल्लै सौ-सौ मण की झूट

घर का पूरा पाट्टै क्यूकर
जनमै रोज नया रंगरुट

बदमाशां के वारे न्यारे
रह्ये रात दिन चांदी कूट

उसकी मंजिल कोसों दूर
जिसका गया हौंसला छूट

'रिसाल' घूमती दिक्खै दुनिया
दारू की इक पी कै घूंट

 - रिसाल जांगड़ा
   साभार - अक्षर ख़बर (फरवरी २००४)

 

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