भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

पं लखमीचंद साहित्य Hindi Literature Collections of Bihari

कुल रचनाएँ: 10

पं लखमीचंद

पं लखमीचंद की रागणियां

रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख ह?...
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कलियुग | रागणी

समद ऋषि जी ज्ञानी हो-गे जिसनै वेद विचारा।
वेदव्यास जी कळूकाल* का हाल लिखण लागे सारा ॥टेक॥
एक बाप के नौ-नौ बेटे, ना पेट भरण पावैगा--
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परीक्षित और कलियुग | रागणी

कहते हैं कि युधिष्ठिर के पोते परीक्षित के बाद कलियुग आरंभ हो गया था। प्रस्तुत है परीक्षित और कलियुग की बातचीत (दादा लखमीचंद की वाणी से)
कलियुग बोल्या परी?...
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जन्म-मरण | रागणी

लाख-चौरासी खतम हुई बीत कल्प-युग चार गए।
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए॥टेक॥
बहुत सी मां का दूध पिया पर आज म्हारै याद नहीं--
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लेणा एक ना देणे दो

लेणा एक ना देणे दो, दिलदार बणे हांडै सैं।
मन म्हं घुण्डी रहै पाप की, यार बणें हांडै सै॥
नई-नई यारी लगै प्यारी, दोष पाछले ढक ले।
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देखे मर्द नकारे हों सैं

देखे मर्द नकारे हों सैं गरज-गरज के प्यारे हों सैं।
भीड़ पड़ी म्हं न्यारे हों सैं तज के दीन ईमान नैं॥
जानकी छेड़ी दशकन्धर नै, गौतम कै गया के सोची इन्द्र नै।
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हो पिया भीड़ पड़ी मै | हरियाणवी रागणी

हो पिया भीड़ पड़ी मैं नार मर्द की, खास दवाई हो,
मेल मैं टोटा के हो सै।
टोटे नफे आंवते जाते, सदा नहीं एकसार कर्मफळ पाते
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एक चिड़िया के दो बच्चे थे | हरियाणवी रागणी

एक चिड़िया के दो बच्चे थे, वे दूजी चीड़ी ने मार दिए!
मैं मर गयी तो मेरे बच्चों ने मत ना दुःख भरतार दिए!!
एक चिड़े की चिड़िया मरगी, दूजी लाया ब्या के!
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मत चालै मेरी गेल | हरियाणवी रागणी

मत चालै मेरी गेल तनै घरबार चाहिएगा 
मैं निर्धन कंगाल तनैं परिवार चाहिएगा
लाग्या मेरै कंगाली का नश्तर, सूरा के करले बिन शस्त्र 
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जीवन की रेल

हो-ग्या इंजन फेल चालण तै, घंटे बंद, घडी रहगी ।
छोड़ ड्राइवर चल्या गया, टेशन पै रेल खड़ी रह-गी ॥टेक॥
भर टी-टी का भेष रेल में बैठ वे कुफिया काल गये -
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पं लखमीचंद का जीवन परिचय (Biography)

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