भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

सतपाल स्नेही

हरियाणवी कवि व ग़ज़लकार सतपाल 'स्नेही' का जन्म 15 अप्रैल 1954 को सोनीपत के गाँव ताजपुर में हुआ। स्नेही जी जिला झज्जर, रोहतक व फरीदाबाद के अनेक सरकारी चिकित्सा संस्थानों में लैब टेक्नीशियन के पद पर कार्यरत रहे हैं। आपका वास्तविक नाम सतपाल शर्मा था लेकिन आप देश के साहित्य प्रेमियों में 'सतपाल स्नेही' के रूप में विख्यात रहे हैं।

सतपाल स्नेही को बचपन से ही गायन में विशेष रुचि थी। बाद में स्नेही जी सहकर्मियों के विदाई समारोहों में विदाई गीत गाते-गाते कब गीतकार बन गए, उन्हें स्वयं भी इसका पता नहीं चला। वर्ष 1975 में अपने फार्मासिस्ट मित्र रमेश कोचर के विदाई समारोह में पहली बार उन्होंने अपनी मौलिक रचना, "चला जा तू ऐ जाने वाले चला जा, मगर याद भी अपनी दिल से लिए जा..." सस्वर पढ़ी थी। उनकी इस रचना को भरपूर दाद मिली और इसी समय वे लेखन को प्रेरित हुए। 

चाहकर भी कुछ बातें जब वे किसी को न कह तो वही शब्द गीतों व गजलों में ढलने लगे। सितंबर 1981 में आकाशवाणी रोहतक से स्नेही का पहला कार्यक्रम प्रसारित हुआ था। दूरदर्शन पर जून 1985 में उनका कार्यक्रम प्रसारित हुआ। दिल्ली, हरियाणा व उत्तर प्रदेश के काव्य मंचों पर अपनी धाक जमाने वाले स्नेही जी दिवंगत गीतकार रामावतार त्यागी व समकालीन गजलकार ज्ञान प्रकाश विवेक से काफी प्रभावित रहे हैं। 

उनकी ग़ज़ल, 'दर्द इतना कि जिन्दगी मुश्किल...'  आज भी उनके प्रशंसकों की पहली पसंद है। उनका एक गीत, 'फिर धरती की पावनता के गीत लिखूंगा, गाऊंगा मैं...'  भी श्रोताओं में काफी लोकप्रिय रहा है। उनका गजल संग्रह, 'इम्तिहान बाकी है' उनके निधन के बाद प्रकाशित हुआ है।
 
कृतियाँ 

कोई पथ भूली किरण
इम्तिहान बाकी है

निधन

11 नवंबर 2022 को स्नेही जी का निधन हो गया। 

मेरी पसंदीदा रचनाएँ

आपने अभी तक कोई रचना सहेज कर नहीं रखी है।