भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

क्यूँ अपणे हाथों भाइयाँ का लहू बहावै सै

हरियाणवी ग़ज़ल | सतपाल स्नेही | Haryanvi Ghazal by Satpal Snehi

क्यूँ अपणे हाथों भाइयाँ का लहू बहावै सै
क्याँ ताहीं तू इतना एण्डीपणा दिखावै सै

जाण लिये तू एक दिन इसमै आप्पै फँस ज्यागा
जाल तू जुणसा औराँ ताही आज बिछावै सै

इस्या काम कर जो धरती पै नाम रहै तेरा
बेबाताँ की बाताँ मैं क्यूँ मगज खपावै सै

जिसनै राख्या बचा-बचा कै आन्धी-ओळाँ तै
उस घर मैं क्यूँ रै बेदर्दी आग लगावै सै

छैल गाभरू हो होकै इतना समझदार होकै
क्यूँ अपणे हांगे नै तू बेकार गँवावै सै 

हरियाली अर खुशहाली के इस हरियाणे मै
क्यँ छोरे ‘सतपाल’ दुखाँ के गीत सुणावै सै

-सतपाल स्नेही
 बहादुरगढ़-124507 (हरियाणा)

 साभार - हरिगंधा

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