भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

जितेंद्र दहिया साहित्य Hindi Literature Collections

कुल रचनाएँ: 2

जितेंद्र दहिया

शर्म लाज कति तार बगायी

शर्म लाज कति तार बगायी या माहरे हरयाने मे किसी तरक्की आयी...!
कट्ठे रह के कोए राजी कोनया ब्याह करते ए न्यारे पाटे हैं,
माँ बाप की कोए सेवा नहीं करता सारे राखन...
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बचपन का टेम

बचपन का टेम याद आ गया कितने काच्चे काटया करते,
आलस का कोए काम ना था भाजे भाजे हांड्या करते ।
माचिस के ताश बनाया करते कित कित त ठा के ल्याया करते
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जितेंद्र दहिया का जीवन परिचय (Biography)

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